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Chandigarh News: बेटी से दुष्कर्म करने वाले पिता की मौत की सजा हाईकोर्ट ने रद्द की

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बेटी से दुष्कर्म करने वाले पिता की मौत की सजा हाईकोर्ट ने रद्द की
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कहा, किसी की जिंदगी खत्म करना गलत, यदि निर्णय लेना जरूरी हो तो दुर्लभतम मामलों का सिद्धांत लागू हो
-हाशिए पर मौजूद तबके से होने का हवाला देते हुए उम्रकैद में तब्दील

अमर उजाला ब्यूरो

चंडीगढ़। 12 साल की नाबालिग बेटी से दुष्कर्म करने वाले पिता की अपील पर सुनवाई करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने उसकी मौत की सजा को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी की जिंदगी खत्म करना गलत है और यदि इस पर निर्णय लेना जरूरी हो तो दुर्लभतम मामलों का सिद्धांत लागू किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने याची को दोषी करार देने के फैसले को बरकरार रखते हुए उसकी सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया है। 28 सितंबर 2020 को मिली एक शिकायत के बाद सिरसा महिला पुलिस स्टेशन ने दुष्कर्म का मामला दर्ज किया था। एफआईआर के अनुसार आरोपी पिता ने शराब के नशे में पत्नी के साथ मारपीट की और उसे घर से बाहर निकाल दिया। इसके बाद उसने सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली 12 साल की बेटी से दुष्कर्म किया। सिरसा अदालत ने नवंबर 2022 में याची को दोषी करार देते हुए कहा था कि उसने रिश्ते से विश्वास घात कर पीड़िता की मां की गैर मौजूदगी में अपनी बेटी की पवित्रता को नष्ट किया है। यदि उसे मौत से कम सजा दी गई तो यह पीड़िता और उसकी मां के साथ अन्याय होगा। ऐसे में अदालत ने इसे दुर्लभतम मामला मानते हुए याची को मौत की सजा सुनाई थी। इस सजा के खिलाफ अपील पर अपना फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने याची की सजा के संबंध में अपना केस साबित कर दिया है। याची एक भी व्यक्ति को अपने पक्ष में गवाही देने में सक्षम नहीं हो पाया है, यहां तक की उसका भाई व मां भी उसके पक्ष में आगे नहीं आए, किसी भी स्वतंत्र व्यक्ति की तो बात ही छोड़ दें। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि अपराध प्राकृतिक अभिभावक यानी पिता द्वारा घर की सीमा के भीतर ही किया गया था, उसके शेष प्राकृतिक जीवन को आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील करते हुए पीठ ने कहा कि दोषी जाहिर तौर पर समाज के हाशिए पर रहने वाले तबके से है और मजदूरी करता था और उसकी कोई आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह कृत्य भयावह है और केवल इस तथ्य के आधार पर कोई सहानुभूति नहीं दिखाई जा सकती है कि आरोपित के दो और बच्चे हैं।
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