पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि सैनिक की तलाकशुदा बेटी को मां की मृत्यु के बाद तलाक होने के बावजूद पारिवारिक पेंशन मिलेगी। रीता 1999 से पति से अलग और मां पर आश्रित थीं। हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक की तारीख के आधार पर पेंशन नहीं रोकी जा सकती।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि किसी सैनिक की तलाकशुदा बेटी को केवल इस आधार पर पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसका तलाक उसकी मां की मृत्यु के बाद हुआ। नियमों के अनुसार पूर्व सैनिक की अविवाहित या तलाकशुदा आश्रित बेटी को माता-पिता की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन का हकदार माना जाता है।
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ये था केस
जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस विकास सूरी की खंडपीठ ने यह आदेश केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज करते हुए दिए जिसमें आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (एएफटी) चंडीगढ़ के आदेश को चुनौती दी गई थी। एएफटी ने 26 जुलाई 2023 को रीता शर्मा को उनकी मां मोतिया देवी की मृत्यु के बाद आश्रित पेंशन देने का आदेश दिया था। रीटा शर्मा के पिता 30 अक्तूबर 1946 को सेना में भर्ती हुए थे और 17 मई 1965 को सेवा से मुक्त कर दिए गए थे। उन्हें विकलांगता पेंशन भी मिली थी। उनकी मृत्यु 14 फरवरी 1986 को हुई।
इसके बाद उनकी पत्नी मोतिया देवी को पारिवारिक पेंशन दी गई लेकिन उनकी मृत्यु 10 अगस्त 2005 को हो गई। इसके बाद रीटा शर्मा ने तलाकशुदा और आश्रित बेटी होने के आधार पर पेंशन का दावा किया। केंद्र सरकार का तर्क था कि चूंकि रीटा का तलाक 12 दिसंबर 2006 को हुआ यानी मां की मृत्यु के बाद इसलिए उसे पेंशन का अधिकार नहीं है।
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हाईकोर्ट ने पाया कि 1999 से ही रीटा शर्मा अपने पति से अलग रह रही थीं और पूरी तरह मां पर आश्रित थीं। अदालत ने कहा कि जब रीटा शर्मा अपनी मां मोतिया देवी पर जीवित रहते ही आश्रित थीं, तो केवल इस आधार पर उन्हें पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता कि तलाक का आदेश मां की मृत्यु के बाद पारित हुआ। इस प्रकार हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का आदेश बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर दी।