चंडीगढ़। कोविड-19 ने अन्य बीमारियों के साथ मनोरोग के मरीजों की स्थिति को गंभीर करने का काम किया है। कोविड और मनोरोग के इलाज के लिए दी जाने वाली दवा के बीच में इंटरेक्शन होने से लॉन्ग कोविड की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इस स्थिति में मानसिक परेशानियां तीव्र गति से बढ़ती हैं। घबराहट, अवसाद और कुछ अन्य मानसिक परेशानियों से ग्रस्त लोगों की समस्या कोविड के बाद से तेजी से बढ़ी है। इलाज के साथ तनाव प्रबंधन और देखभाल पर ध्यान देने की जरूरत है। यह जानकारी विश्व मनोरोग एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. अफजल जावेद ने पीजीआई में मेंटल हेल्थ पर वीरवार से शुरू हुए डायमंड जुबली सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि दी। उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी यह बात स्वीकार किया है कि कोविड के बाद एंजायटी, डिप्रेशन और कुछ गंभीर परेशानियां तेजी से बढ़ी हैं। यह स्थिति मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र के लिए चुनौती बनती जा रही है इसलिए मानसिक स्वास्थ्य के प्रति लोगों का जागरूक होना बेहद जरूरी है, ताकि लोग परेशानी शुरू होने से पहले ही उसके बचाव के मानकों का पालन सुनिश्चित कर गंभीर स्थिति में जाने से बच सकें।
उंगलियों को नहीं, पूरे शरीर को रखिए सक्रिय
डॉ. जावेद ने बताया कि कोविड के दौरान इंटरनेट एडिक्शन तेजी से बढ़ा है। जो बच्चे पहले दोस्तों के साथ बाहर जाकर खेलते थे, वे अब घरों में ऑन स्क्रीन गेम खेल रहे हैं। उनकी उंगलियां तो जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो गई है, लेकिन शरीर निष्क्रिय होता जा रहा है। यह स्थिति बेहद घातक बन रही है। शारीरिक क्रियाशीलता की कमी के कारण गंभीर बीमारियों के साथ मानसिक समस्याएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। कोविड के बाद बच्चों में भी मानसिक परेशानियां तेजी से बढ़ रही हैं। अभिभावक बच्चों को सक्रिय रखने का प्रयास करें। समय निकालकर उनके साथ घर से बाहर निकलें ताकि वे शारीरिक रूप से सक्रिय बन सके। क्योंकि शोध साबित कर रहे हैं कि अब जलवायु परिवर्तन भी मेंटल हेल्थ को प्रभावित कर रहा है। शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत होकर ही इन चीजों का सामना किया जा सकता है।
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पहले मरीज पागलखाने जाते थे अब आत्महत्या कर रहे
सम्मेलन में आए विशेषज्ञों ने बताया कि वर्षों पहले मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्ति को पागलखाने में भर्ती कराया जाता था। ऐसा उस व्यक्ति के घर के लोग अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखकर करते थे, लेकिन अब परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। पागल खाने धीरे-धीरे खाली होते जा रहे हैं। क्योंकि तनावग्रस्त व्यक्ति पागलखाने पहुंचने से पहले ही आत्महत्या का रास्ता चुन रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति बेहद गंभीर है। इससे बचाव के लिए बातचीत और सामाजिक सरोकार का दायरा बढ़ाने की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों में बढ़ते मानसिक रोग का मुख्य कारण अभिभावकों द्वारा उनकी अनदेखी करना है क्योंकि ज्यादातर अभिभावक मनोरोग विशेषज्ञ के पास यह शिकायत लेकर आ रहे हैं कि उनका बच्चा बिगड़ रहा है जबकि उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि उसके बदलते व्यवहार या गलत कार्य के करने के पीछे क्या वजह उत्तरदायी है।
75 प्रतिशत मनोरोगी 25 साल की उम्र से पहले हो रहे शिकार
डॉ. जावेद ने बताया कि सर्वे रिपोर्ट से भी यह बात साबित हो चुकी है कि मानसिक रोग का शिकार होने वाले 75 प्रतिशत व्यक्ति में यह समस्या 25 साल से पहले शुरू हो जाती है। वहीं बच्चों में मनोरोग की स्थिति पर गौर किया जाए तो इसकी चपेट में आने वाले लगभग 50 प्रतिशत बच्चे 15 साल से पहले इस समस्या से ग्रस्त होते हैं। ऐसे में इस स्थिति से बचाव के लिए चाइल्ड साइकोलॉजी, स्कूल हेल्थ और एडोलिसेंट मेंटल हेल्थ जैसे कार्यक्रमों पर फोकस करना जरूरी है।
अवसाद सिंड्रोम बन जाए इससे पहले संभल जाइए
सम्मेलन में आए विशेषज्ञों ने बढ़ते मानसिक रोग पर काबू के लिए पॉजिटिव साइकोलॉजी अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि तनाव की स्थिति में पहुंचने से पहले ही उसके प्रबंधन की बात पर विचार शुरू होना बेहद जरूरी है क्योंकि डिप्रेशन या अवसाद जब तक लक्षण और फीलिंग तक सीमित होता है तब तक वह गंभीर नहीं होता लेकिन वह सिंड्रोम बनते ही स्थिति को खतरनाक बना देता है क्योंकि इससे उस व्यक्ति के शारीरिक को मानसिक अवस्था के साथ ही उसका काम, परिवार, आर्थिक स्थिति यहां तक कि सब कुछ प्रभावित होने लगती है।