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शारीरिक सुनवाई बंद, वकील और मुंशी बोले- कैसे चलेगा घर

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चंडीगढ़। कोरोना की दूसरी लहर कहर बरपा रही है। दिन-प्रतिदिन संक्रमितों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस बीच सेशन जज ने जिला अदालत में केवल जरूरी मामलों की सुनवाई करने के आदेश जारी किए हैं, वह भी वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से। ये सुनवाई भी 30 अप्रैल के बाद ही शुरू होंगी।
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ऐसे में जिला अदालत के 2600 वकीलों, 250 मुंशियों और 58879 मुवक्किलों की परेशानी बढ़ गई है। वकीलों और मुंशियों का कहना है कि वह वकालत पर निर्भर हैं। इसके अलावा उनके पास आय का कोई साधन नहीं। अब तक वह पिछले साल का कर्ज नहीं चुका पाए हैं। एक बार फिर अदालत में शारीरिक सुनवाई को बंद करने का निर्णय सही नहीं है। इससे एकबार फिर वकीलों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा। वहीं, वीडियो कान्फ्रेंसिंग से सुनवाई के दौरान साक्ष्य को रिकॉर्ड करना या बहस करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
जिला अदालत में 58879 मामले लंबित
फरवरी 2020 तक देश की अदालतों में तीन करोड़ से अधिक मामले लंबित थे। पिछले साल लागू लॉकडाउन के कारण यह संख्या 4.5 करोड़ को पार कर गई है। चंडीगढ़ जिला अदालत में कुल 58879 मामले लंबित हैं। इनमें 46713 आपराधिक और 12166 सिविल मामले हैं।
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सरकार की तरफ से नहीं मिली सहायता
वकीलों का कहना है कि उन्हें सरकार की तरफ से किसी प्रकार की कोई सहायता नहीं मिली। इस वजह से वकीलों ने अपने जानने वालों से पैसे उधार लिए और अब कर्जदार हैं। कुछ महीने पहले ही अदालती कार्रवाई सही प्रकार से शुरू हुई थी, जिससे हालात थोड़े बेहतर होने लगे थे। अब एक बार फिर उन्हें आर्थिक संकट से घिरने का भय सता रहा है।
काम रोकना समस्या का समाधान नहीं
कोरोना बचाव के लिए अब तक कोई वैक्सीन पूरी तरह कारगर साबित नहीं हुई है। कोरोना हमारे साथ ही चलेगा, इसलिए काम रोकना समस्या का समाधान नहीं है। वीडियो कान्फ्रेंसिंग से सभी मामलों पर सुनवाई चलती रहनी चाहिए थी। काम रोकने से लोग बीमारी की बजाय भुखमरी से मरने लगेंगे।
- रविंदर सिंह बस्सी, वकील, जिला अदालत
सुनवाई बंद करने से वकीलों संग आम जनता होगी प्रभावित
पिछली बार केंद्र और राज्य सरकार ने वकीलों की मदद के लिए कोई योजना शुरू नहीं की थी। बार काउंसिल ने कई वकीलों को आर्थिक मदद दी थी। शारीरिक सुनवाई बंद करने की बजाय सावधानियां बरती जा सकती थीं। अदालतों के पूर्ण रूप से बंद होने की वजह से वकीलों के साथ आम जनता भी प्रभावित होगी।
-पुनीत छाबड़ा, वकील जिला अदालत
इस बार तो स्थिति और खराब है, होने लगी है चिंता
एक बार फिर सभी मुंशियों को खाने के लाले पड़ने वाले हैं। पिछली बार तो वकीलों ने थोड़ी बहुत मदद कर संकट से बचा लिया था लेकिन इस बार स्थिति काफी भयावह है। पिछली बार के बारे में सोच कर अभी भी डर लगता है। परिवार में छह सदस्य हैं, जिनकी हर समय चिंता रहती है।
मोनू, मुंशी, जिला अदालत
खर्चे कैसे चलेंगे, सरकार को करनी चाहिए मदद
बच्चों की पढ़ाई, एलआईसी की किस्त, घर के जरूरी सामानों की खरीदारी, यह सब खर्च कैसे चलेंगे, यही सोचकर परेशान हूं। पिछले साल का कर्ज अभी तक नहीं उतरा है। ऐसे में दोबारा काम ठप हो गया है। सरकार को हमारी मदद करनी चाहिए। पिछली बार भी कहीं से कोई भी सहायता नहीं मिली थी।
-मोहित, मुंशी, जिला अदालत
अदालत बंद रहेगी तो न्याय कैसे मिलेगा
घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को किस तनाव से गुजरना पड़ता है, इसका अंदाजा अदालत को होना चाहिए है। लॉकडाउन के कारण पिछले साल मुझे गुजारा भत्ता नहीं मिल पा रहा है। इस बार फिर यही स्थिति हो रही है। बच्चे मानसिक तनाव में हैं। अदालत के बंद होने से हमें न्याय कैसे मिलेगा।
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- मीनू बिष्ट, पीड़ित, घरेलू हिंसा
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