कल तक जो हमसे खेतों में काम करवा रहे थे। उनकी भी लॉकडाउन के दौरान नियत बदल गई। वह हमारी मजबूरी का फायदा उठाकर पूरे दिन की दिहाड़ी 100 और 120 रुपये दे रहे थे। हालांकि हम चुपचाप डटे हुए थे कि काम धंधा खुल जाएगा और सब ठीक हो जाएगा, लेकिन लॉकडाउन की अवधि बढ़ती गई। अब खाने और किराया देने के लाले पड़ने लग पड़े थे। जो पैसे अपने पास थे वे खर्च हो गए थे। रेल से जाने में रजिस्ट्रेशन के कारण बहुत दिन लगने थे।
इसलिए हम सभी लोगों ने अपने घरों से पैसे मंगवाकर नए साइकिल खरीदे और अपनी मंजिल पर बिहार जाने के लिए निकल पड़े। कुछ ऐसी ही अपनी बेबसी बताई 18 साइकिलों पर जा रहे बिहार के बेतिया के रहने वाले लोगों ने। यह सभी साइकिलों पर खरड़-लांडरा हाईवे पर चप्पड़चिड़ी के नजदीक से गुजर रहे थे। इस ग्रुप की अगुवाई करने वाले वरिंदर मेहतों ने बताया कि अब तो बस एक ही सपना है कि सही सलामत अपने घर पहुंच जाएं। वहां पर थोड़ा खा लेंगे लेकिन दोबारा अपना गांव नहीं छोडेंगे।
आसान नहीं साइकिल का सफर
वरिंदर मेहतो ने बताया कि जब शनिवार को तय हो गया था कि लॉकडाउन-4 शुरू हो जाएगा तो इसके बाद से हमने तय कर लिया था कि अब हमें अब अपने गांव ही लौटना है। इस दौरान उन्होंने अपने इलाके के सभी लोगों को इकट्ठा किया। सबने अपने कमरे के किराए और राशन वाले के पैसे दिए और इसके बाद जो पैसे की कमी आ रही थी। ऐसे में मजबूरी में अपने घरों से पैसे मंगवाए गए। इसके बाद एक साथ सभी लोगों के लिए 18 साइकिल प्रति साइकिल 3800 रुपये कीमत के हिसाब से खरीदी। इसके बाद रास्ते के लिए अपना जरूरी सामान साइकिल पर रखकर सभी सोमवार को बिहार के लिए रवाना हो गए।
नमकीन चिड़वे और पानी के सहारे करेंगे सफर
इसी ग्रुप के प्रवासी अशोक ने बताया कि हमारे पास जेब में ज्यादा पैसे नहीं हैं। हमने सफर शुरू करते समय नमकीन और चिड़वे मिक्स कर लिए थे। सबने रास्ते में खाने के लिए अपनी साइकिल पर इन्हें रख लिया और पानी की बोतलें भर ली हैं। धूप में करीब 10 किलोमीटर साइकिल चलाकर थक जाते हैं तो रास्तें में कहीं भी किसी पेड़ या नजदीक किसी मंदिर में पेड़ की छाया में बैठकर आराम कर लेेते हैं।
अशोक ने बताया कि गत सोमवार की रात उन्होंने एक मंदिर के बरामदे में गुजारी है और मंगलवार को सुबह फिर से सफर शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा कि गर्मी ज्यादा है, ऐसे में 10 दिन तो उन्हें अपना सफर तय करने में लग ही जाएंगे। हमारे गांव तक करीब 14 सौ किलोमीटर का सफर बाकी है।
रेल से जाने का प्लान था, लेकिन नहीं आया जवाब
इसी तरह प्रवासी नागेंद्र ने बताया कि पहले उन्होंने रेल से जाने की योजना बनाई थी। इसके लिए बकायदा रजिस्ट्रेशन व अन्य औचारिकताएं पूरी की गई। उम्मीद थी कि जल्दी ही ट्रेन जाने के लिए मैसेज आ जाएगा। लेकिन ट्रेन वाला मैसेज कभी हनीं आया। उन्होंने दोबार आवेदन किया। आखिरी में जब वह हार गए तो उन्होंने साइकिल पर जाना ही उचित समझा।
पंजाब में सब मददगार, हरियाणा जाने से लग रहा डर
ग्रुप में शामिल लोगों ने बताया कि पंजाब से वह बिना किसी डर से सड़क से आ रहे है। कई जगह पुलिस वाले भी मददगार बने। लोगों ने लंगर लगाए हुए है। लेकिन हरियाणा के सफर को लेकर डर लग रहा है। सुना है कि वहां की पुलिस गाड़ियों में भरकर दोबारा पंजाब बार्डर पर छोड़ रही है । साथ ही मारपीट कर रही है। ऐसे में अब भगवान का ही सहारा है।
सीएम नीतिश से नाराज, नहीं ली सुध
इस दौरान ग्रुप में शामिल सभी लोगों का साफ कहना था कि वह अपने राज्य के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से काफी नाराज हैं। सीएम को पता है कि पंजाब में अधिकतर लोग काम के लिए गए हुए हैं और वहां से अपने गृह राज्य आना चाहते हैं। लेकिन उन्होंने एक ट्रेन तक नहीं चलवाई। जबकि वह खुद रेल मंत्री तक रह चुके हैं। लेकिन उन्होंने उनकी सुध नहीं ली, इसलिए हम उनसे नाराज हैं। बिहार में हमें केवल वोट की तरह इस्तेमाल किया गया है।