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बेबसीः तपती सड़क पर नंगे पांव, दर्द से बिलखती मासूम, मां बोली- चल बेटा मंजिल अभी दूर है

Wed, 20 May 2020 11:51 AM IST
खुशबू गोयल दीपक शाही, जीरकपुर
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घर के लिए पैदल निकले प्रवासी मजदूर - फोटो : अमर उजाला
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मां सड़क बहुत गर्म है, इस धूप में नंगे पांव चल नहीं पा रही हूं। मासूम का हाथ खींच कल्पना बोली.. बेटा अभी मंजिल दूर है। मां की बात सुनकर बच्ची चुप हो गई और नंगे पांव तपती धूप में चंडीगढ़-अंबाला मार्ग पर अपनी दादी की उंगली पकड़े मां व छोटे भाई के साथ चलने लगी। लेकिन उसके चेहरे के सिकन उसका दर्द साफ बयां कर रहे थे।
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तपती सड़क पर उसके पांव लड़खड़ा रहे थे और उसकी दादी उसे खींच रही थी। उसकी मां उसे गोद में भी नहीं ले सकती थी, क्योंकि गोद में पहले ही एक और बच्चा था और दादी खुद बुजुर्ग हैं और उनके सिर पर सामान लदा हुआ था। इस लॉकडाउन में बेबस असहाय कल्पना और उसकी मां को चिलचिलाती धूप और सुलगती सड़कें भी सुकून भरी लगने लगी हैं। कल्पना की तरह बिहार जाने वाले करीब 100 से ज्यादा दिहाड़ीदार पैदल हाईवे के रास्ते निकल रहे थे।

कोविड-19 हेल्प लाइन एप की जानकारी नहीं
कोविड-19 हेल्प लाइन एप पर ऑनलाइन आवेदन के बाद देश के विभिन्न राज्यों में लोगों को उनके प्रदेश तक श्रमिक स्पेशल ट्रेन के माध्यम से भेजा जा रहा है। इस बाबत जब कल्पना से बात की गई, कि आपने क्यों नहीं आवेदन किया, तो उसका जवाब था कि कोविड-19 हेल्प लाइन एप क्या होता है। हम तो ठहरे अनपढ़। हमें इसके बारे में जानकारी नहीं है।
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अब सवाल ये है कि पूरे ट्राइसिटी में कल्पना जैसे सैकड़ों प्रवासी श्रमिक होंगे। जो अपने घर जाने के लिए एप के जरिए ऑनलाइन आवेदन नहीं कर सकते। क्योंकि वे पढ़े लिखे नहीं है और न ही उन्हें इस एप की जानकारी है। ऐसे में चंडीगढ़, मोहाली व पंचकूला प्रशासन का क्या यह दायित्व नहीं बनता कि वे इन दिहाड़ीदारों के ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की जिम्मेदारी उठाएं।

सिर पर थैला, हाथ में पानी का बोतल लिए निकली मासूम
कोरोनो से बेबस जिंदगी और घर लौटने की जिद में झुलसती गर्मी के दौरान अपने परिवार के साथ सात साल की संध्या सिर पर बड़ा थैला और हाथ में पानी का बोतल लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हैं। उसके पांव में चप्पल जरूर है, लेकिन मासूम सिर पर बोझ लिए सैकड़ों किलोमीटर कैसे चलेगी। संध्या कहती है वे पंजाब से आ रहे हैं।

इस गर्मी में चलते-चलते पांव का बुरा हाल हो गया है। उसके माता-पिता को अभी पीछे एक गांव में लोगों ने कोरोना के चलते नलके से पानी तक नहीं भरने दिया। संध्या बोली प्यास से गला सूखा जा रहा था, तभी रास्ते में एक अंकल ने पानी की बोतल दी। पापा कहते हैं कि यहां काम बंद है, खाना नहीं मिलेगा। इसलिए यहां से जाना पड़ेगा तो पैदल चल रही हूं।
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