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कोरोना महामारी से जुड़े सात सवाल और उनके जवाब, जो हर किसी को पता होने चाहिएं...यहां पढ़ें

Mon, 10 Aug 2020 12:39 PM IST
पंचकुला ब्‍यूरो आशीष वर्मा, चंडीगढ़
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डॉ. अविरल वत्स - फोटो : अमर उजाला
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यूके के स्कॉटलैंड में नेशनल हेल्थ सर्विस में कार्यरत डॉ. अविरल वत्स जाने-माने वैज्ञानिक व विशेषज्ञ हैं। उनकी पढ़ाई-लिखाई चंडीगढ़ में हुई है और कई देशों में रहकर उन्होंने शोध कार्य किए हैं। इस समय वह यूके में नेशनल हेल्थ सर्विस से जुड़े हैं। कोविड-19 से जुड़े मरीजों को देखने और समझने का उनके पास अच्छा अनुभव है। अमर उजाला से विशेष बातचीत में उन्होंने बताया कि इस समय सबसे जरूरी संक्रमण को रोकना है और यह तभी संभव हो सकेगा, जब ज्यादा से ज्यादा टेस्ट होंगे। टेस्ट इतने ज्यादा होने चाहिए कि किसी व्यक्ति को दिन में दस बार छींक आ जाए तो उसका सैंपल लेकर कोविड टेस्ट के लिए भेज दिया जाए। पढ़िए कोरोना से संबंधित उनसे पूछे गए प्रमुख सवालों के जवाब।
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सवाल : भारत में कोरोना पीक पर है या भयानक मंजर आना अभी बाकी है?
जवाब :
पीक का पता तभी चलता है, जब वह आकर चला जाता है। पॉजिटिविटी रेट जब 14 दिनों तक पांच फीसदी या उससे कम रहे तो इसका मतलब है कि पीक आकर चला गया और वायरस का फैलाव कम हो रहा है। भारत में केस लगातार बढ़ रहे हैं। कह सकते हैं कि पीक पर अभी नहीं पहुंचे हैं। मंजर आना बाकी है। भारत का पॉजिटिविटी रेट करीब नौ फीसदी है। इसका मतलब है कि 100 व्यक्तियों के टेस्ट होने पर नौ व्यक्ति संक्रमित मिल रहे हैं।

सवाल : भारत का रिकवरी रेट अभी करीब 68 फीसदी है। कितनी फीसदी रिकवरी रेट होने पर माना जाए कि भारत कोरोना की लड़ाई जीत रहा है?
जवाब :
रिकवरी रेट यह नहीं बताता है कि आप लड़ाई जीत रहे हैं। यह आपको सिर्फ दिलासा या उम्मीद दिखा सकता है। भारत में डेथ रेट का डाटा ठीक नहीं है। मुझे भारत से फोन आते हैं और बताते हैं कि कोविड से मिलते-जुलते लक्षण से मौत हो गई, लेकिन कोरोना टेस्ट नहीं किया। ऐसी स्थिति में डेथ रेट का भी ठीक से नहीं पता चलता है। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि वायरस के फैलाव को रोकना। जितनी जल्दी संक्रमित व्यक्ति और उसके संपर्क में आए लोगों का टेस्ट कर पाएंगे, तब इस संक्रमण को रोकना संभव होगा।
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सवाल : टेस्ट का सही पैमाना क्या है? यहां पर बिना लक्षण व हल्के लक्षण वालों के टेस्ट नहीं हो रहे?
जवाब :
यूके में एक हजार की आबादी पर 150 व्यक्तियों के टेस्ट हो रहे हैं, जबकि भारत में इतनी आबादी पर 15.5 लोगों के टेस्ट होते हैं। टेस्टिंग इतनी कॉमन हो जानी चाहिए कि यदि किसी व्यक्ति को दिन में दस बार छींक आ जाए तो उसका सैंपल लेकर कोरोना की जांच के लिए भेज देना चाहिए।

सवाल : संक्रमित व्यक्ति में कितने दिनों तक एंटीबॉडीज रहती हैं। क्या कोई पुख्ता स्टडी है?
जवाब :
जब कोई व्यक्ति संक्रमित होकर ठीक हो जाए तो समझिए कि उसके शरीर में एक सुरक्षा कवच बन चुका है। बिना लक्षण वाले, हल्के लक्षण वाले व ज्यादा लक्षण वाले मरीजों में अलग-अलग समय तक एंटीबॉडीज बनने का स्तर पाया गया है। जो स्टडी आई हैं, वह बताती हैं कि ठीक होने वाले मरीजों में दो से तीन महीने बाद एंटीबॉडीज का स्तर गिरा है, जबकि फ्लू में कम से कम एक साल तक एंटीबॉडीज रहती हैं। एंटीबॉडीज का स्तर गिरना चिंताजनक है।

सवाल : हर्ड इम्युनिटी का क्या फंडा है? भारत में हर्ड इम्युनिटी कब तक आ सकती है?
जवाब :
जब किसी देश की एक थ्रैशोल्ड आबादी संक्रमित होकर ठीक हो जाए तो समझिए हर्ड इम्युनिटी किसी वायरस के खिलाफ विकसित हो चुकी है। कोरोना के लिए यह थ्रैशोल्ड 60 फीसदी तक माना गया है। इस हिसाब से भारत की 78 करोड़ आबादी संक्रमित होनी चाहिए। यदि एक फीसदी भी डेथ रेट लेकर चलें तो इस हिसाब से 78 लाख लोगों की मौत होगी। यह स्ट्रैटेजी ठीक नहीं है। वैक्सीन से हर्ड इम्युनिटी का गोल लेकर चलें तो बेहतर रहेगा। लोगों की जान खतरे में नहीं डाल सकते।
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सवाल : आम आदमी को कोरोना की वैक्सीन कब तक मिलेगी?
जवाब :
दो वैक्सीन तीसरे फेज के ट्रायल में हैं। सब कुछ ठीक रहा तो मैं उम्मीद कर सकता हूं कि अगले साल के मध्य तक आम आदमी को वैक्सीन मिल जाएगी। सबसे पहले हाई रिस्क वाले लोगों यानी डाक्टर, नर्सेज व हेल्थ कर्मियों को मिलेगी। एक वैक्सीन को तैयार करने में अमूमन 3-8 साल लगते हैं, लेकिन कोरोना के लिए वैक्सीन का काम बहुत तेजी से चल रहा है।

सवाल : भारतीयों के लिए आपकी कोई सलाह?
जवाब :
हमारे पास सबसे बड़ा हथियार मास्क और दो मीटर की दूरी है। मास्क को अच्छी तरह से पहनें। दो मीटर की दूरी बनाकर रखें, हाथ को बराबर धोते रहें और कम से कम बाहर निकलें। युवाओं को समझना होगा कि वह जब बाहर जाते हैं तो अपने साथ घर पर वायरस ला सकते हैं, जो उनकी जिंदगी के साथ उनके परिवार व समाज को खतरे में डाल सकती है।

सवाल : जीरकपुर से स्कॉटलैंड का सफर कैसा रहा?
जवाब :
मेरे पैरेंट्स अब भी जीरकपुर में रहते हैं। चंडीगढ़ में काम करने के बाद फ्रांस, आस्ट्रेलिया, नीदरलैंड में रहकर मेडिकल रिसर्च क्षेत्र में काम किया। इस समय स्कॉटलैंड में नेशनल हेल्थ सर्विस में कार्यरत हूं।
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