चंडीगढ़ कांग्रेस को रविवार को जबरदस्त झटका लगा। कांग्रेस के ग्रामीण जिला अध्यक्ष और गांव दड़वा के पूर्व सरपंच गुरप्रीत सिंह हैप्पी भाजपा में शामिल हो गए। वे 14 साल पहले भी भाजपाई थे। रविवार को आयोजित समारोह में गुरप्रीत सिंह को भाजपा में शामिल करवाने के लिए प्रदेश अध्यक्ष संजय टंडन और पंचकूला के विधायक ज्ञानचंद गुप्ता सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।
इस मौके पर गुरप्रीत सिंह के समर्थक भी मौजूद रहे। भाजपा में शामिल होने के बाद गुरप्रीत सिंह ने कहा कि यह उनकी घर वापसी है। उनकी सबसे पहली सदस्यता भाजपा में ही थी। फिर उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन कर लिया। तन मन से कांग्रेस में सेवाएं दीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद नैतिक तौर पर अध्यक्ष और जिलाध्यक्ष को अपना अपना इस्तीफा दे देना चाहिए था।
लेकिन वह गद्दी का मोह नहीं छोड़ पा रहे है। अब गांवों की समस्याएं, लाल डोरे का मसला हल करवाने का प्रयास भाजपा के माध्यम से करेंगे। संजय टंडन ने कहा कि गुरप्रीत सिंह की घर वापसी हुई है। इससे भाजपा को मजबूती मिली है। उनकी काबलियत के अनुसार जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। बता दें कि गुरप्रीत सिंह जिला परिषद के सदस्य भी रहे हैं।
गुरप्रीत हैप्पी का भाजपा में जाना सुनियोजित राजनीतिक दबाव : छाबड़ा
गुरप्रीत सिंह के भाजपा में शामिल होने पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप छाबड़ा ने कहा कि जिस तरह पूरे देश में अलोकतांत्रिक तरीके से धन, बल और सत्ता के दुरुपयोग से दवाब बनाकर दल-बदल किया जा रहा है, वह अब चंडीगढ़ में भी देखने को मिला। प्रदीप छाबड़ा ने कहा कि पिछले कार्यकाल में सांसद किरण खेर ने एक जनसभा में कहा था कि गुरप्रीत सिंह मैंने तुम्हारा होटल बचाया।
फिर एक जनसभा में गांव के लोगों ने कम्युनिटी सेंटर की मांग की तो खेर ने कहा था कि क्यों न हैप्पी जी के होटल को कम्युनिटी सेंटर बना दिया जाए। इससे लगता है कि भाजपा में उनका जाना राजनीतिक दवाब का नतीजा है। छाबड़ा ने कहा कि राहुल गांधी के इस्तीफा देने के साथ चंडीगढ़ कांग्रेस की सभी इकाइयां भंग हो चुकी है। अब न कोई जिलाध्यक्ष है और न प्रदेश पदाधिकारी।
बंसल और छाबड़ा पार्टी कार्यकर्ताओं का ध्यान रखें : तिवारी
गुरप्रीत सिंह के भाजपा में शामिल होने पर कांग्रेस प्रदेश महासचिव शशि शंकर तिवारी ने कहा कि हैप्पी जैसे नेता का पार्टी छोड़ कर जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। पार्टी के वरिष्ठ नेता पवन बंसल व प्रदीप छाबड़ा को वक्त रहते संभल जाना चाहिए और पार्टी कार्यकर्ताओं के हर सुख-दुख में उनकी सुध लेनी चाहिए, तभी कार्यकर्ताओं का मनोबल बना रह सकेगा। ऐसा नहीं होने पर कांग्रेस कमजोर होती जाएगी। लोकसभा चुनाव के दो महीने बीतने के बाद भी पार्टी नेताओं ने हार की समीक्षा के लिए कोई बैठक नहीं बुलाई। कार्यकर्ता हताश-निराश बैठे हैं।