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सतर्क रहें अभिभावक: बच्चों को दूसरों से आगे निकलने की होड़ में न डालें... कहीं जान पर न बन जाए पीयर प्रेशर

Thu, 14 Sep 2023 04:06 PM IST
निवेदिता वर्मा वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

मनोचिकित्सक राहुल चक्रवर्ती ने बताया कि कोई भी आत्महत्या करने वाला रातों रात इसका इरादा नहीं करता। कुछ दिन पहले से इसकी तैयारी की जाती है। वे कुछ दिन पहले से ही मैं अब शिकायत नहीं करूंगा, अब नहीं आऊंगा, मैं चला जाऊंगा जैसे वाक्यों का प्रयोग करने लगता है।
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child - फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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अगर आपके बेटे ने परीक्षा में 90 प्रतिशत अंक लिए हैं और उसके साथी ने 90.20 फीसदी.. तो अपने बच्चे को हतोत्साहित न करें। उसकी तुलना उसके साथी से मत कीजिए। पढ़ाई की ही तरह कॅरिअर चुनने या पसंद न पसंद से जुड़े मामले में तुलना के आधार को दरकिनार कर दें। क्योंकि यह आपके बच्चे को तनाव और अवसाद में ले जा सकता है। इससे वह आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम भी उठा सकता है। ये बातें पीजीआई मनोरोग विभाग के चाइल्ड एंड एडोलेसेंट साइकोलॉजी के विशेषज्ञ डॉ. अखिलेश शर्मा ने कहीं। वे मनोचिकित्सा विभाग की ओर से आयोजित प्रेसवार्ता में आत्महत्या के कारण और बचाव पर जानकारी दे रहे थे।

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उन्होंने बताया कि पीयर प्रेशर (साथियों का प्रभाव या दबाव) में कई बार बच्चे अपने ग्रुप के साथियों की तरह दिखने या कूल शो करने के लिए जाने-अनजाने में दूसरों की देखादेखी करने लगते हैं। वहीं माता-पिता भी उनकी तुलना उनसे करते हैं। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों पर अक्सर परीक्षा में साथी की अपेक्षा अच्छे नंबर लाने का दबाव होता है। कई बार बच्चे इससे भी प्रभावित हो जाते हैं कि हर कोई ऐसा कर रहा है तो हमें भी करना चाहिए। ऐसे में बच्चे चीजों या लोगों से प्रभावित होकर फैसला लेने लगते हैं जो कई बार नकारात्मक प्रभाव दे सकता है। ऐसे में माता-पिता और शिक्षक को चाहिए कि वे हर विद्यार्थी को एक ही तराजू में न तौलें। बच्चे को उनकी रुचि के विपरीत विषय दिलाने का निर्णय भी आत्महत्या की ओर ले जा सकता है।

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इसका रखें ध्यान तो बच सकती है अनमोल जान
मनोचिकित्सक राहुल चक्रवर्ती ने बताया कि कोई भी आत्महत्या करने वाला रातों रात इसका इरादा नहीं करता। कुछ दिन पहले से इसकी तैयारी की जाती है। वे कुछ दिन पहले से ही मैं अब शिकायत नहीं करूंगा, अब नहीं आऊंगा, मैं चला जाऊंगा जैसे वाक्यों का प्रयोग करने लगता है। हालांकि, यह संकेत उनके साथ रहने वाले मित्रों या परिजनों को पता चलते हैं। जिसे समय रहते समझ कर किसी तनावग्रस्त युवा या बच्चे की जान बचाई जा सकती है। यदि इन बातों की तरफ ध्यान दिया जाए तो आत्महत्या का इरादा बदला जा सकता है। वहीं, युवाओं का भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रहने के कारण भी वे असफल होने पर आत्महत्या का रास्ता चुन रहे हैं।

युवावस्था में तत्काल निर्णय का जोश
युवावस्था संक्रमण काल है, जिसमें युवाओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। खासतौर से कॅरिअर, जॉब, रिश्ते, खुद की इच्छाएं, व्यक्तिगत समस्याएं जैसे लव अफेयर, मैरिज, सेटलमेंट, बेहतर भविष्य शामिल हैं। जब युवा इस अवस्था में आता है तो बेरोजगारी का शिकार हो जाता है और भविष्य के प्रति अनिश्चितता बढ़ जाती है। इससे डिप्रेशन, एंजाइटी, सायकोसिस, पर्सनालिटी डिसऑर्डर की स्थिति बन जाती है। इसके बीच वह परिवार की जरूरत से ज्यादा अपेक्षाओं के बोझ तले दब जाता है। एक के बाद एक परेशानी से घिरा युवक आत्महत्या के बारे में ज्यादा बात करने लगता है।
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पुरुष ज्यादा दबाव में
पुरुष तनाव के कारणों को किसी से शेयर नहीं करते, इसलिए उनके सफल आत्महत्या करने के मामले महिलाओं से चार गुना ज्यादा होते हैं। वहीं, दूसरी ओर महिलाएं अपनी बात ज्यादा शेयर करती हैं, जिससे उनके सुसाइड की कोशिश करने पर बचा लिया जाता है जबकि उनके कोशिश करने के मामले पुरुषों से चार गुना ज्यादा होते हैं। किशोर व युवाओं की मृत्यु का तीसरा सबसे बड़ा कारण आत्महत्या है।

बच्चों के लिए इसका रखें ध्यान
- इंटरनेट टाइम लिमिट बनाएं
- बच्चे पर रखें छिपी नजर
- बच्चों से बातें करें
- सही और गलत का अंतर समझाएं
- बच्चे की अच्छी चीजों की खुलकर तारीफ करें

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