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Chandigarh News: बच्चों को ट्रेनिंग देकर अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुक्केबाज तैयार कर रहे कोच जोगिंदर सिंह

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चंडीगढ़। बिना किसी स्वार्थ के जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को ट्रेनिंग देकर अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर के मुक्केबाज तैयार करने में जुटे हैं शहर के मुक्केबाजी एवं कोच जोगिंदर सिंह। जिन बच्चों को वह बॉक्सिंग के गुर सिखाते हैं उनमें कोई भी बड़े घरों से ताल्लुक नहीं रखते। इनके यहां से ट्रेनिंग लेने वालों में कुक, मिस्त्री, दुकान पर काम कर दिहाड़ी करने वाले लोगों के बच्चे मुक्केबाजी की ट्रेनिंग ले रहे हैं।
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पंजाब पुलिस में एएसआई के पद पर तैनात जोगिंदर सिंह सेक्टर-9 के पंजाब पुलिस के हेडक्वार्टर में तैनात हैं। उन्हें बच्चों को मुक्केबाजी सिखाने का जुनून है। जोगिंदर सिंह गरीब घर के बच्चों को सेक्टर-3 के बोगनविलिया गार्डन के खुले क्षेत्र में मुक्केबाजी का निशुल्क प्रशिक्षण देते हैं। यहां पर रोजाना 40 से 50 खिलाड़ी इनकी निगरानी में अभ्यास करते हैं। इनका कहना है कि जब मेरे सिखाएं बच्चे नेशनल और इंटरनेशनल स्तर पर मेडल जीतकर लाते हैं तो मेरे लिए वहीं सबसे बड़े पुरस्कार होता है। जोगिंदर सिंह इन बच्चों को खुद मुक्केबाजी के खेल के उपकरण भी खरीदकर देते हैं, जिससे वह अभ्यास कर सकें।



इंटरनेशनल स्तर पर बढ़ाया मान

जोगिंदर सिंह इन बच्चों को पिछले कुछ सालों से ट्रेनिंग देकर तराशने का काम कर रहे हैं। इसी महीने जुलाई में इनके ट्रेनी अभिनाश जमवाल ने वर्ल्ड बॉक्सिंग कप में सिल्वर मेडल हासिल करके दिखाया है। इस वर्ल्ड बॉक्सिंग कप के मुकाबलों का आयोजन कजाकिस्तान में किया गया था। अभिनाश ने यह मेडल 55 किलो भार वर्ग में हासिल किया है। वहीं, इनके यहां ट्रेनिंग लेने वालों में कुक के बेटे रोहित चमोली ने दुबई में खेली गई जूनियर बॉक्सिंग चैंपियनशिप में मंगोलिया के बेहतरीन मुक्केबाज ओटगन बयार को हराकर देश के लिए स्वर्ण पदक जीता था। इसके साथ ही कार ड्राइवर के बेटे स्पर्श ने भी नेपाल और चीन में स्वर्ण पदक और राजमिस्त्री के बेटे कुलदीप ने कजाकिस्तान में कांस्य पदक जीता है। काेच जोगिंदर सिंह का कहना है कि बच्चों की ओर से जीते हुए पदक उन्हें हर रोज कुछ नया करने के लिए प्रेरित करते है।
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मुक्केबाज नहीं बन पाए थे खुद
नयागांव में रह रहे जोगिंदर सिंह ने बताया कि उन्हें बचपन से ही मुक्केबाजी का शौक था। इसी में करियर बनाने का जुनून था, लेकिन बेहतर सुविधाएं न मिल पाने के कारण वह अपना सपना पूरा नहीं कर पाए। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे पेशेवर प्रशिक्षण ले पाते। लिहाजा अपने इसी टूटे सपने को जरूरतमंद बच्चों की आंखों में देख रहा हूं। छह साल हो चुके हैं बच्चों को बॉक्सिंग सिखाते हुए और बहुत से बच्चे आज सफल मुक्केबाज बन चुके हैं।
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