पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में बंदरों के उत्पात को रोकने के लिए उठाए गए कदमों का ब्योरा सौंपते हुए यूटी प्रशासन ने सीधे तौर पर स्थानीय नागरिकों को जिम्मेदार ठहराया है। प्रशासन ने कहा कि लोगों को बार-बार जागरूककिया जाता है कि बंदरों को कुछ खाने को न दिया जाए परंतु मंदिरों, ढाबों व रेस्तरां आदि के बाद उन्हें खाने को दिया जाता है, जिसके चलते उनकी आबादी बढ़ रही है।
मामला इमारत से बंदर की ओर से गिराए गए पत्थर के कारण 17 साल के युवक की जान जाने से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता की वकील एडवोकेट एकता ठाकुर ने इस मामले को सीधे तौर पर प्रशासन की लापरवाही करार दिया था। इस मामले में दाखिल याचिका पर हाईकोर्ट के आदेशों पर प्रशासन मृतक के परिजनों को अंतरिम रूप से 2 लाख का मुआवजा दे चुका है। पिछली सुनवाई पर हाईकोर्ट ने बंदरों के उत्पात से शहर को बचाने के लिए प्रशासन से उठाए गए कदमों का ब्योरा तलब किया था। इसके साथ ही मुआवजे पर भी जवाब मांगा था। प्रशासन की ओर से मुख्य वन संरक्षक ने हलफनामा दाखिल करते हुए कहा कि मृतक के परिजनों को 2 लाख मुआवजा काफी है और नहीं दिया जाना चाहिए।
इस मामले में बंदर के काटने से नहीं बल्कि पत्थर के गिरने से युवक की मौत हुई थी। किसी को नहीं पता कि वह पत्थर बंदर ने गिराया था या किसी और कारण से गिरा था। इसके साथ ही बंदरों को रोकने के मामले में अपनी मजबूरियों का रोना रोते हुए मुख्य वन संरक्षक ने कहा कि बंदरों को पकड़ने के लिए उनके पास पर्याप्त साधन मौजूद हैं, लेकिन बंदरों को सुखना वाइल्ड लाईफ सेंचुरी में छोड़ने के अतिरिक्त उनके पास कोई विकल्प मौजूद नहीं है। इसके साथ ही यदि बंदरों को मारने की बात करे तो बंदर वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत संरक्षित है और इसलिए उसे मारा भी नहीं जा सकता है।