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छाबड़ा के इस्तीफे पर हावी गुटबाजी, सोनिया गांधी लेंगी फैसला

Mon, 02 Jan 2017 01:11 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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सोनिया गांधी
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प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप छाबड़ा ने नगर निगम चुनाव में हार के बाद नैतिकता की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया था, लेकिन पार्टी हाईकमान अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं कर पा रही है। 
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जानकारी के अनुसार चंडीगढ़ कांग्रेस में दोनों पूर्व केंद्रीय मंत्रियों की आपसी फूट और खींचतान से पार्टी हाईकमान दुविधा में है। अब इस पर अंतिम फैसला सोनिया गांधी को लेना है।

एक ओर जहां पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी का गुट चाहता है कि छाबड़ा को अध्यक्ष पद से हटा दिया जाए। वहीं दूसरी ओर पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन बंसल का गुट प्रदीप छाबड़ा को एक और मौका देने के समर्थन में अड़ा है। 
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चुनाव परिणामों के बाद तिवारी गुट ने आरोप लगाया था कि चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव में हुई हार के लिए मुख्य तौर पर बंसल और छाबड़ा ही जिम्मेदार है। जिसके बाद से यह कयास लगाए जा रहे थे कि छाबड़ा को अध्यक्ष पद से हटा दिया जाएगा, लेकिन अभी तक छाबड़ा के कार्यकाल पर संशय बरकरार है।
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बस्सी को मिल सकती है अहम जिम्मेदारी

Pawan Kumar Bansal - फोटो : अमर उजाला
वहीं इस बारे में पार्टी प्रभारी आशा कुमारी का कहना है कि छाबड़ा का इस्तीफा उन्होंने आगे राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेजा है। पार्टी अध्यक्ष होने के नाते वह ही प्रदेशाध्यक्ष के पद को लेकर अंतिम फैसला करेंगी। हालांकि बताया जा रहा है कि पार्टी प्रभारी आशा कुमारी भी छाबड़ा का इस्तीफा नामंजूर करने की पक्षधर है।

वहीं कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप छाबड़ा का कहना है कि बेशक भाजपा ने ईवीएम मशीनों में छेड़छाड़ करके जीत हासिल की है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने नैतिकता के आधार पर अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने कहा कि जल्द ही ईवीएम मशीनों की छेड़छाड़ के खिलाफ कांग्रेस पार्टी सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल करने जा रही है।

बस्सी को मिल सकती है अहम जिम्मेदारी :
सूत्रों के मुताबिक पार्टी में मुकेश बस्सी को जल्द ही अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है। प्रदेशाध्यक्ष छाबड़ा भी बस्सी को संगठन में पदाधिकारी बनना चाहते हैं। बस्सी को प्रदेश महासचिव बनाया जा सकता है। 

इसके साथ ही दवेंद्र सिंह बबला और शीला फूल सिंह दोनों को पदमुक्त किया जाएगा, क्योंकि अब वह पार्षद बन गए हैं। दोनों से टिकट वितरण से पहले ही एक पद एक नेता की नीति पर चलते हुए इस्तीफा ले लिया था ताकि चुनाव जीतने के बाद अलग से इस्तीफा न लेने की जरूरत पड़े। बस्सी ने चुनाव लड़ने से इंकार भी कर दिया था।
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