चंडीगढ़। शहरवासियों को अब सेक्टरों में नर्सिंग होम की जरूरत महसूस हो रही है। लोगों का कहना है कि अचानक से इलाज की जरूरत पड़ने पर सबसे पहले शहर के तीन प्रमुख अस्पतालों पीजीआई, मेडिकल कालेज और जीएमएसएच-16 की ओर भागते हैं लेकिन यहां लंबा इंतजार करना पड़ता है। कई बार तो स्थिति ऐसी बनती है कि मरीजों को लेकर मोहाली या पंचकूला के निजी अस्पताल जाना पड़ता है। वहां इलाज तो मिल जाता है लेकिन जब बिल आता है तो परेशानी खड़ी हो जाती है क्योंकि यहां इलाज का खर्चा लाखों में पहुंच जाता है। कई मरीज तो बिल देने के लिए सक्षम ही नहीं होते। कुल मिलाकर आम आदमी न तो सरकारी अस्पताल में इलाज करा पाता है और न ही निजी अस्पताल में। इन सारी समस्याओं का एक ही विकल्प है कि चंडीगढ़ में छोटे नर्सिंग होम खोले जाएं।
आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ. आरएस बेदी कहते हैं कि पीजीआई व मेडिकल कॉलेज की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं में चंडीगढ़ का नाम है, लेकिन सच्चाई यह है कि इस शहर में स्वास्थ्य की आधारभूत सुविधाएं न के बराबर हैं। यदि इलाज की जरूरत पड़ जाए तो सोचना पड़ता है कि कहां जाएं। चंडीगढ़ में बुजुर्ग परिवार सबसे ज्यादा हैं। ऐसे में यहां तो छोटे नर्सिंग होम को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि कम खर्चे में इलाज उपलब्ध हो सके। इन नर्सिंग होम में निजी अस्पतालों के मुकाबले खर्च करीब 60 से 70 फीसदी तक कम होता है और सेक्टरों में होने के कारण आसपास के लोग रात में भी इलाज कराने पहुंच सकते हैं। अधिकतर नर्सिंग होम हेल्थ बीमा पॉलिसी के दायरे में आते हैं। ऐसे में मरीजों को इलाज के लिए ज्यादा जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती।
अब समस्या यह है कि चंडीगढ़ प्रशासन नर्सिंग होम के प्रति उदासीन रहा है। साल 1999 में चंडीगढ़ में 28 से ज्यादा नर्सिंग होम होते थे, लेकिन अब 11 या 12 बचे हैं। चंडीगढ़ में कोई भी नर्सिंग होम पॉलिसी नहीं है, जबकि पंचकूला में है। पंचकूला के कई सेक्टरों में छोटे-छोटे नर्सिंग होम खुले है, जो कम दाम पर बेहतर इलाज की सुविधा उपलब्ध कराते हैं। कोरोना के बाद लोगों को जरूरत महसूस हुई तो इस मुद्दे का एडवाइजरी काउंसिल में लाया गया है। सांसद किरण खेर ने इसके लिए पहल की है। दस फरवरी को एडवाइजरी काउंसिल की बैठक होनी, जिसमें कई सारे मुद्दे उठाए जाने हैं।
चंडीगढ़वासी कई सालों से उठा रहे हैं मांग
सेक्टरों में छोटे नर्सिंग होम खोलने की मांग पिछले कई वर्षों से शहरवासी कर रहे हैं। उनका कहना है कि चंडीगढ़ में रहने के बावजूद उन्हें न तो पीजीआई में इलाज मिल पाता है और न ही मेडिकल कालेज में। इन सभी अस्पतालों की इमरजेंसी व ओपीडी बाहर से आए मरीजों से भरी रहती है। चंडीगढ़ के जामा मस्जिद के इमाम व एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य मौलाना मोहम्मद अजमल खान का भी कहना है कि शहर की जरूरत को देखते हुए नर्सिंग होम का निर्माण होना चाहिए।
प्रशासन पुरानी पॉलिसी को फिर से लागू करे
नर्सिंग होम की पुरानी पॉलिसी को लागू किया जाना चाहिए। आज भी मरीजों को दिखाने के लिए ऑनलाइन ओपीडी का सहारा लेना पड़ रहा है। नर्सिंग होम होते तो लोगों को परेशानी नहीं आती। चंडीगढ़ प्रशासन को चाहिए कि वह इस पॉलिसी पर विचार करें और उसे लागू करे। प्रशासन को इस मुद्दे को शहरवासियों के नजरिए से सोचना चाहिए।
-रविंदर सिंह बिट्टू, चेयरमैन फॉसवेक व सदस्य एडवाइजरी काउंसिल
आज की जरूरत हैं नर्सिंग होम
चंडीगढ़ में नर्सिंग होम की जरूरत है। प्रधानमंत्री भी चाहते हैं कि सभी को समय पर सस्ता इलाज मिले। कई सेक्टर वासियों ने इस बारे में हमसे कहा है कि सेक्टरों में छोटे निजी हास्पिटल होने चाहिए लोग ताकि तसल्ली से इलाज करवा सकें। मध्यवर्गीय परिवार इन नर्सिंग होम में इलाज करवा सकता है, क्योंकि आज हर किसी के पास हेल्थ पॉसिली होती है। लोग इलाज चाहते हैं, धक्के नहीं।
-हितेश पुरी, चेयरमैन क्राफ्ड व सदस्य एडवाइजरी काउंसिल