‘देश में दुराचार के अधिकतर मामले या तो किन्हीं कारणों से दर्ज ही नहीं हो पाते हैं या अपने निर्णय तक नहीं पहुंच पाते हैं। इस कारण अपराधी आजाद घूमते रहते हैं और अगले शिकार के लिए निकल पड़ते हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार देश में एक साल में दुराचार के मामले 2011 में 16 हजार से बढ़कर अब 24 हजार हो गए हैं। इनमें लगातार बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे हालात में ऐसे अपराधियों को ऐसी सख्त से सख्त सजा सुनाई जानी चाहिए। ताकि ऐसे जघन्य अपराध करने वालों से समाज को सुरक्षित रखा जाए और यह समाज के लिए एक संदेश के तौर पर जाए।’
उक्त गंभीर टिप्पणी महिला अपराध के मामलों की सुनवाई के लिए गठित विशेष कोर्ट की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) पूनम आर जोशी ने दस वर्षीय बच्ची से दुराचार और उसके बाद मां बनने के मामले में दोनों दोषियों को सजा सुनाते हुए की। एडीजे ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में एक छोटी बच्ची के साथ केवल रेप ही नहीं हुआ, बल्कि इसके बाद उसने एक नवजात को भी जन्म दिया, जिसे इस क्रूर दुनिया में अकेला छोड़ दिया गया। दोषियों द्वारा किया गया अपराध किसी उदारता के लायक नहीं है। अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोनों को ऐसी सजा सुनाई जानी चाहिए, कि वह समाज में ऐसी हरकतें और सोच रखने वाले लोगों को हतोत्साहित करे।
अदालत ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रतिक्रिया दी कि बच्ची के साथ जो कुछ हुआ उसका दाग उसे जीवनभर ढोना पड़ेगा। यह ऐसा दाग है जो उसे जीवनभर हर पड़ाव पर डराएगा। दोषियों ने बहुत ही जघन्य, पाप और अनैतिक कार्य किया है। दोषियों की उम्र उसके पिता की उम्र के समान है। ऐसी उम्र में जब उसके खेलने-कूदने और बचपन जीने का वक्त है, दोषियों ने उसके साथ घिनौनी हरकत कर उस पर गर्भवती होने का बोझ डाल दिया। ऐसे अपराधी माफी या किसी तरह की उदारता के लायक नहीं हैं। इनकी सजा समाज के लिए संदेश के तौर पर जानी चाहिए।