प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों के अनुभव काफी कड़वे रहे हैं। महंगा इलाज बेबस पब्लिक सीरीज के तहत कुछ मरीजों ने अपने अनुभव शेयर किए। मरीजों के अनुरोध पर उनके नाम प्रकाशित नहीं किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि अस्पताल कैसे उन्हें डराकर ओवरचार्जिंग करते हैं।
पहले सब ठीक और अचानक इमरजेंसी
चंडीगढ़ में रहने वाले सुनील डुडेजा (बदला हुआ नाम) की प्रेग्नेंट बेटी का इलाज शहर की एक बड़ी गाइनेकोलाजिस्ट से चल रहा था। सात महीने तक हर 15 दिन बाद रुटीन चेकअप होता रहा। जांच में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। एक दिन बेटी ने डाक्टर को बताया कि दर्द ज्यादा हो रहा है। डाक्टर ने कहा कि बेड रेस्ट कीजिए। ठीक हो जाएगा।
कुछ दिन बाद रुटीन चेकअप कराने गए तो डाक्टर ने कहा कि इमरजेंसी है। तुरंत आपरेशन करना होगा। परिजनों को इतना भी समय नहीं मिला कि वे किसी दूसरे डाक्टर से परामर्श कर सके। डाक्टर ने यह भी बताया कि यहां पर आपरेशन नहीं हो पाएगा, क्योंकि पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं।
इसलिए उन्हें दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करना होगा। बेटी को शहर के एक बडे़ प्राइवेट हास्पिटल में एडमिट कराया गया। आपरेशन से प्री मेच्योर बच्ची हुई। दो दिन बच्ची को आईसीयू में रखा गया है। उसके बाद उसे हास्पिटल के नीयोनेटल एनआईसीयू (नीकू) में रखा गया।
बिल ने उड़ाये होश
एनआईसीयू का एक दिन का खर्च 10 हजार रुपये से ज्यादा था। करीब सवा महीने तक बच्चे को नीकू में रखा गया। सुनील के मुताबिक नीकू में डाक्टर बताते थे कि बच्चे का वजन 50 ग्राम कम हो गया है, जब आंखों के सामने बच्चे को तौला जाता तो वजन सही निकलता था।
परिजनों को बच्चे से मिलने के लिए सिर्फ 15 मिनट का समय दिया जाता था। उन्हें लगता था कि बच्चा ठीक है, लेकिन इसके बावजूद उसे नीकू में रखा गया। जब बिल आया तो सभी के होश उड़ गए। सात लाख से ज्यादा का बिल बनाया गया। सोचा था कि करीब ढाई से तीन लाख का बिल आएगा।
हास्पिटल की फार्मेसी से ही दवा
सुनील ने बताया कि हास्पिटल मेडिसिन व अन्य सभी चीजें खुद ही खरीदकर देता था। सभी दवाएं उनकी फार्मेंसी से आती थी। जब पूछते थे कि क्या दवा दी है तो उल्टा सवाल खड़ा कर देते थे कि आपको हास्पिटल पर विश्वास नहीं है। पीड़ित ने प्रशासन से मांग की है कि जो धक्के नहीं खाना चाहते वे इलाज प्राइवेट में कराना चाहते हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि अस्पताल उसे लूटने में लग जाए। कम से कम इलाज में पारदर्शिता बहुत जरूरी है। रेट पर लगाम कसनी होगी। सरकारी अस्पतालों में शोषण बहुत हैं। अब मरीज जाए तो जाए कहां? इस पर प्रशासन व सरकार को सोचना चाहिए।
2500 रुपये की दवा, एक कीमो के वसूले 15 हजार
चंडीगढ़ के व्यापारी पंकज मित्तल (बदला हुआ नाम) को एक दिन अचानक टायलेट में चक्कर आया और वह बेहोश हो गए। परिजन उन्हें जीएमएसएच 16 ले गए। वहां से पीजीआई रेफर कर दिया गया। पीजीआई जाने के बजाए परिजन उन्हें मोहाली के एक निजी अस्पताल में ले गए।
जांच में अस्पताल ने बताया कि उनके बोन में कैंसर हैं। आईसीयू में उन्हें एडमिट कर लिया गया। करीब 15 दिन तक वे भर्ती रहे। जब उन्हें डिस्चार्ज किया गया तो परिजनों को पूरे साढ़े सात लाख का बिल थमा दिया गया।
ग्लव्स का रेट 300-500 तक वसूले
ट्रीटमेंट के दौरान प्रयोग में आने वाले ग्लव्स के रेट 300-500 रुपये तक लगाया। बेड के तीन हजार तो आईसीयू के पांच हजार रुपये। डाक्टर और स्पेशलिस्ट डाक्टर की विजिट का अलग-अलग रेट था। पैरामेडिकल स्टाफ का भी अतिरिक्त चार्ज लगाया गया था।
रेट में लूट की ऐसे खुली पोल
उसके बाद अस्पताल ने उन्हें कीमोथैरेपी के लिए बुलाया। एक कीमोथैरेपी में उनसे 15 हजार रुपये लिए। जब दोबारा उन्हें बुलाया गया तो कीमो में इस्तेमाल होने वाली दवा का डाक्टर से साल्ट लिखवा लिया। उस दवा का रेट चंडीगढ़ के अन्य केमिस्ट शॉप में पूछा तो वे हैरान हो गए। केमिस्ट शॉप ने उन्हें उस दवा का रेट मात्र 2500 रुपये बताई।
उस हिसाब से उनकी कीमो का रेट मात्र 2500 से चार हजार रुपये में पड़ता है, क्योंकि हास्पिटल में दो घंटे रुकने व डाक्टर का खर्च तो अस्पताल लेगा, लेकिन 15 हजार रुपये हद से भी ज्यादा हैं। उसके बाद उन्होंने निजी अस्पताल के बजाए पीजीआई कीमोथैरेपी शुरू कर दी है। हालांकि पीजीआई में भीड़ होने के कारण उन्हें थोड़ी दिक्कत आएगी।
यदि आपको लगता है कि आपके इलाज पर भी ओवरचार्जिंग की गई है तो इसकी सूचना हमें प्रमाण के साथ दें। ई-मेल के लिए chd-cityreporter@chd. amarujala.com का इस्तेमाल करें। यदि फोन से सूचना देना चाहते हैं तो मोबाइल नंबर 9569492729 पर मैसेज भेज सकते हैं।