दवाओं की आपूर्ति हुई बंद
दुकान बंद करने की कवायद के बीच पिछले 3 महीने से दवाओं की आपूर्ति ठप कर दी गई है। स्थिति यह हो चुकी है कि औषधि की दुकान में दवा रखने वाली अलमारियां खाली पड़ी हैं। दवाओं के लिए आने वाले मरीजों को लौटाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है।
दूसरी कंपनी को देने की तैयारी
जन औषधि की संचालनकर्ता कंपनी हिंदुस्तान एंटीबायोटिक लिमिटेड के हेड प्रवीण कुमार का कहना है कि ब्यूरो फार्मा पब्लिक इंडिया से अनुरोध किया गया था कि मानव संसाधन कम होने के कारण उसके संचालन में परेशानी आ रही है। इसलिए वे गोल मार्केट की जन औषधि को भी ले लें, लेकिन पीजीआई ने ऐसा करने से मना कर दिया है। पीजीआई प्रशासन का कहना है कि जब तक कांट्रेक्ट की समय सीमा समाप्त नहीं होती, तब तक किसी अन्य कंपनी को संचालन की अनुमति नहीं दी जा सकती।
इन मरीजों का दुख कौन करेगा दूर
पीजीआई के गोल मार्केट स्थित जन औषधि की दुकान से मैं 2009 से दवाइयां ले रहा हूं। मैं अपने साथ में कई ऐसे लोगों की दवाइयां भी वहां से खरीदता हूं जिनके पास महंगी दवाएं खरीदने के लिए पैसे नहीं है। ऐसे में अगर वह दुकान बंद हो गई तो काफी मरीजों को परेशानी झेलनी पड़ेगी।
-रमिंदर पाल सिंह
गोल मार्केट की जन औषधि की दुकान से मेरी ही तरह सैकड़ों मरीज दवाइयां लेते हैं। वह दुकान गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। पीजीआई प्रशासन और दुकान का संचालन करने वाली कंपनी को उन मरीजों के बारे में भी सोचना चाहिए।
-रविन्द्र सिंह बाली
जो दवाइयां अन्य दवा की दुकानों पर 10 से 15 हजार रुपये में आती हैं। वही दवा गोल मार्केट की जन औषधि दुकान पर एक से डेढ़ हजार रुपये में आ जाती है। सरकार गरीबों को सस्ता इलाज मुहैया कराने का दावा करती है फिर इस दुकान को बंद करने का निर्णय कैसे लिया जा सकता है।
-के. दत्त
गोल मार्केट की जन औषधि की दुकान केवल चंडीगढ़ के मरीजों के लिए ही नहीं बल्कि बाहर से आने वाले हजारों मरीजों के लिए भी संजीवनी है। गंभीर बीमारियों से जुड़ी दवाइयां यहां बेहद कम दाम में उपलब्ध है। इस दुकान की मदद से ही हजारों गरीब मरीजों को इलाज मिल रहा है। इसे बंद होने से रोकना होगा।
-मनजीत सिंह पन्नू
जन औषधि के लिए पीजीआई ने हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लिमिटेड को संचालन की अनुमति दी है। ऐसे में उस कंपनी को दिए गए समयावधि के पूरे हुए बिना किसी अन्य कंपनी को संचालन की अनुमति नहीं दी जा सकती। -डॉ. अशोक कुमार, पीजीआई प्रवक्ता