पीजीआई की न्यू ओपीडी के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित बायोकेमेस्ट्री लैब में सैंपल देना और उसकी फीस जमा करना मरीजों के लिए पहाड़ पर चढ़ने से कम नहीं है। यहां सुबह 8 से 12 बजे तक चार घंटे में 600 से 700 मरीज आते हैं। एक सैंपल देने के लिए उन्हें तीन बार लाइन में लगना पड़ता है। एक तो भीड़ और ऊपर से गर्मी।
ओपीडी में एसी भी नहीं है। नतीजा यह होता है कि एक-दो मरीज रोज चक्कर खाकर गिर जाते हैं। गौरतलब है कि पीजीआई के डायरेक्टर ने भी ऐलान किया था कि 14 जनवरी 2014 तक नई व्यवस्था के तहत सैंपल देने का काम शुरू हो जाएगा। इसके तहत वेटिंग हॉल और टोकन सिस्टम शुरू होना था। लेकिन उनका दावा खोखला साबित हुआ। उनके इस झूठ से मरीजों को कड़वे घूंट भरने पड़ रहे हैं।
अभी क्या स्थिति है
मरीज को सबसे पहले न्यू ओपीडी के फीस काउंटर में लाइन में लगकर फीस जमा करानी पड़ती है। उसके बाद उन्हें बायोकेमेस्ट्री लैब में लाइन में लगकर सैंपल के लिए शीशी मिलती है। यहां पर सबसे ज्यादा घुटन महसूस होती, क्योंकि जगह कम और मरीजों की भीड़ ज्यादा होती है। शीशी लेने के बाद मरीज को सैंपल देने के लिए अलग-अलग रूम में भेजा जाता है। यहां भी मरीजों को लाइन में लगना पड़ता है।
यह मिलनी थी राहत
मरीजों को राहत देने के लिए करीब दो साल पहले बायोकेमेस्ट्री लैब में एक नई व्यवस्था बनाने का फैसला हुआ था। इसमें मरीजों को फीस जमा करने के साथ काउंटर से शीशी मिल जाती। उसके बाद उन्हें वेटिंग हॉल में बैठना पड़ता। सैंपल देने के लिए लैब में नौ से दस काउंटर बनाए जाने थे। काउंटर से माइक से मरीजों को बुलाया जाता और उनके सैंपल देकर वापस भेज दिया जाता।
लेकिन अब तक हुआ कुछ नहीं
मरीजों को राहत देने के लिए डेढ़ साल पहले पीजीआई की ओर से वेटिंग हॉल और टोकन सिस्टम शुरू होना था। इसके लिए काउंटर बनाए गए हैं और काउंटर में माइक लगवा दिए गए हैं। वोटिंग हॉल बन गया है, लेकिन उसमें कबाड़ भरकर बंद कर दिया गया है। अब तक शीशी मिलना भी शुरू नहीं हो पाई है।
काउंटर बनने से लैब की जगह कम पड़ गई है। गर्मी से राहत देने के लिए भी कोई इंतजाम नहीं किया गया है। कुल मिलाकर अब तक 20 से 30 प्रतिशत तक ही काम हो पाया है। काम कब तक पूरा होगा, इस बारे में किसी के पास कोई जवाब नहीं है।
डायरेक्टर की ओर से दावा किया गया था कि एक जनवरी 2014 तक मरीजों के लिए वेटिंग हॉल और टोकन सिस्टम बन जाना था, लेकिन अब तक कुछ नहीं हो पाया है। बिना किसी कारण के यह देरी हो रही है। मरीजों को रोजाना परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसा लग रहा है कि पूरा सिस्टम डायरेक्टर के कंट्रोल से बाहर निकलता जा रहा है।
-अश्विनी मुंजाल, जनरल सेक्रेटरी, मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट एसोसिएशन