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लॉकडाउन में कलह से टूटने की कगार पर पहुंचे, चंडीगढ़ के ‘एक मित्र’ ने बचाए 180 घर

Mon, 11 Jan 2021 11:30 AM IST
निवेदिता वर्मा नवदीप मिश्रा, अमर उजाला, चंडीगढ़
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सगीना वलयाट और शिप्रा बंसल। - फोटो : अमर उजाला
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फिल्म ‘थप्पड़’ हम सभी के जेहन में है। लॉकडाउन के दौरान रील लाइफ की यह कहानी असल जिंदगी में भी देखने को मिली। पति-पत्नी के बीच आपसी कलह और घरेलू हिंसा से कई परिवार टूटने के कगार पर थे। ऐसे मामलों में महिलाओं की पीड़ा देखकर चंडीगढ़ की समाजसेवी शिप्रा बंसल और महिला अधिवक्ता सगीना वलयाट आगे आईं और  ऑनलाइन ‘एक मित्र’ मंच की स्थापना की।

 

इस मंच पर महिलाओं ने अपने परिवार के कलह को साझा किया। इसके बाद शिप्रा बंसल और सगीना ने मिलकर महिलाओं के जीवन को दोबारा संवारने की कोशिश की, जिसमें इन्हें काफी हद तक सफलता मिली। पिछले तीन माह में पारिवारिक विवाद के 294 मामलों में से 180 में सुलह हो चुकी है और दंपती खुशहाल जीवन जी रहे हैं।

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‘एक मित्र’ मंच की संस्थापक समाजसेवी शिप्रा बंसल और महिला अधिवक्ता सगीना वलयाट ने बताया कि अपने आसपास की महिलाओं की पीड़ा देखकर उनके मन में विचार आया कि एक ऐसा मंच बनाया जाए जहां महिलाएं अपनी बात साझा कर सकें। जुलाई माह में शिप्रा और सगीना ने ‘एक मित्र’ नाम से सोशल मीडिया पर महिलाओं को मंच दिया। फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर जब महिलाओं को यह मंच मिला तो उन्होंने अपनी बात साझा की। 

सगीना ने बताया कि एक केस ऐसा था, जिसमें पति-पत्नी पिछले एक साल से साथ रह रहे थे। दोनों काम करने भी जाते थे, लेकिन लॉकडाउन में घर व ऑफिस के काम के बीच दोनों में कलह बढ़ने लगी। हालात यह हो गए कि मारपीट तक हो गई। शिप्रा ने बताया कि चंडीगढ़ में ज्यादातर महिलाएं शिक्षित हैं, इसलिए इस मंच के माध्यम से बातचीत करना आसान लगा। शिप्रा व सगीना ने बताया कि जुलाई से नवम्बर तक हमारे पास 294 केस पारिवारिक विवाद के आए, उसमें से 180 में हमने परिवारों को एकजुट किया है। 114 केसों में अभी सुलह का प्रयास चल रहा है।
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कभी खाने तो कभी चैनल को लेकर हुआ विवाद 
सगीना ने बताया कि ‘एक मित्र’ मंच पर महिलाओं को विश्वास हुआ तो उन्होंने खुले दिल से अपनी बात रखी। ज्यादातर मामले ऐसे थे, जिसमें खाने को लेकर या टेलीविजन पर चैनल बदलने को लेकर झगड़ा हुआ था और फिर मामला इतना बढ़ गया कि नौबत मारपीट तक पहुंच गई। हालात यह हो गए कि सात जन्मों का बंधन क्षण भर में टूटने की कगार पर आ गया। चंडीगढ़ में भी ऐसी घटनाओं से काफी संख्या में परिवार अवसाद में जा रहे हैं। शिप्रा बंसल ने बताया कि कई मामले ऐसे आए, जिसमें  महिलाओं का तलाक हुआ और उनका बच्चा उनसे अलग हो गया। इस दौरान वह भी अवसाद में रहीं।

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लॉकडाउन में शादी, बाद में नहीं मिले पति-पत्नी के विचार
शिप्रा बंसल ने बताया कि लॉकडाउन में कुछ लोगों ने खर्चा कम होने के चलते शादियां कर दीं। बाद में जब पति-पत्नी के विचार नहीं मिले या शादी में किसी मनमुटाव के कारण रिश्ते टूट गए या दुल्हनों की विदाई ही नहीं कराई गई। ऐसे पांच मामले हमारे सामने आए। फिलहाल इन मामलों में सुलह कराई गई और सभी लोग खुशी से अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

महिला आयोग बनना जरूरी : सगीना वलयाट
महिला अधिवक्ता सगीना का कहना है कि चंडीगढ़ में महिला आयोग का बनना बहुत जरूरी है क्योंकि कुछ मामलों में महिलाएं घर पर खुलकर बात नहीं कर पाती हैं और पुलिस में मामले को ले जाना नहीं चाहती हैं। ऐसे में महिलाओं को काउंसलिंग की जरूरत होती है। सही जगह और सही समय पर काउंसलिंग हो तो कई परिवार टूटने से बच सकते हैं।

ट्रांसजेंडरों के साथ भी हिंसा कम नहीं : शिप्रा बंसल
समाजसेवी शिप्रा बंसल ने बताया कि काउंसिलिंग के दौरान ट्रांसजेंडरों की भी समस्याएं सामने आईं। उनका कहना है कि ट्रांसजेंडर बोर्ड कोई कार्रवाई करता नहीं और यह लोग लॉकडाउन के दौरान घर से बाहर जा नहीं सकते थे। शिप्रा बंसल ने बताया कि यह मंच एक छोटे स्तर से शुरू किया था। आज हमारे पास कई शहरों से मामले आ रहे हैं। जिसे अपने स्तर पर सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं।

अक्सर देखने को मिलता है लोग एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगते हैं। इस परिस्थिति में लोगों को अपना नजरिया बदलना होगा क्योंकि जब एक दूसरे के प्रति नजरिया बदलेगा तो गलती कम अच्छाई ज्यादा दिखेगी। वहीं, आपसी कलह से बचने के लिए सकारात्मक सोच की आवश्यकता है। अपने आप को व्यस्त रखें और जो हमारे पास है, उसमें सकारात्मकता खोजने का प्रयास करें। योग, मेडिटेशन व व्यायाम करने से मन और मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा आती है। हालांकि ऐसा नहीं है कि यह मामले अभी दिखने शुरू हुए हैं। यह तो काफी पहले से चल रहा है, लेकिन लॉकडाउन में यह सामने आने लगे। पहले लोगों को अपने स्तर पर इसे सुधारना चाहिए अथवा परिवार के लोगों की मदद लेनी चाहिए। जब ऐसी परिस्थिति न हो तो विशेषज्ञ की मदद लेकर काउंसलिंग करवानी चाहिए। -प्रो. सीमा विनायक, विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग, पीयू  

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