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बिजली निजीकरण: हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगा प्रशासन

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चंडीगढ़। शहर के बिजली विभाग के निजीकरण की प्रक्रिया पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की रोक के बाद अब प्रशासन सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है। प्रशासक वीपी सिंह बदनौर के साथ अधिकारियों व वकीलों की बैठक के बाद इस बारे में फैसला लिया गया है। यूटी प्रशासक के सलाहकार मनोज परिदा का कहना है कि वह सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे ताकि निजीकरण की रुकी हुई प्रक्रिया को दोबारा शुरू किया जा सके।
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने बीते 28 मई को यूटी पावरमैन की याचिका पर बिजली विभाग के निजीकरण के फैसले और इस संबंध में जारी टेंडर पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी थी। यह रोक तब लगी, जब विभाग टेंडर में आई कंपनियों की वित्तीय बोली खोलने जा रहा था। कंपनियों के आवेदन की जांच के लिए प्रशासन ने एक तकनीकी मूल्यांकन समिति का गठन किया था। इस समिति ने आवेदन करने वाली सात कंपनियों के सभी दस्तावेजों की लगभग जांच कर ली है। इसके बाद अब वित्तीय बोली खोलने की तैयारी थी, लेकिन इससे पहले ही हाईकोर्ट ने रोक लगा दी।
बीते दिनों प्रशासक बदनौर ने सलाहकार मनोज परिदा, भारत सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्यपाल जैन, वकील पंकज जैन व अन्य के साथ बैठक कर विभिन्न विकल्पों पर चर्चा की। अंत में सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का फैसला लिया गया। इस पर प्रशासक के सलाहकार मनोज परिदा ने कहा कि शहर में बिजली विभाग के निजीकरण की प्रक्रिया चल रही है। प्रशासन ने तकनीकी बोली खोल दी है और वित्तीय बोली खोली जानी थी, इस बीच हाईकोर्ट की ओर से प्रक्रिया पर रोक लगा दी गई। अब वह सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे, ताकि इस रोक के हटने के बाद वह निजीकरण की प्रक्रिया को पूरा कर सके। दरअसल, शहर के बिजली विभाग के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू से ही विवादों में रही है। प्रशासन द्वारा मांगे गए आवेदन में कुल 20 कंपनियों ने दस्तावेज खरीदे, जिनमें से छह कंपनियां पात्र पाई गईं। इस बीच प्रशासन ने बोली शर्तों में बदलाव कर दिए और नए बोलीदाताओं को एक बार फिर मौका दिया। इसके बाद अब दौड़ में कुल सात कंपनियां हैं। इनमें अडानी ट्रांसमिशन लिमिटेड, टाटा पावर, टोरेंट पावर, स्टेरेलाइट पावर, रन्यू विंड एनर्जी, एमीनेंट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड और एनटीपीसी इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी लिमिटेड शामिल हैं।
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