पिछले साल की तरह चंडीगढ़ प्रशासन के विभाग इस साल भी बजट पूरा खर्च नहीं कर पाए। सीटीयू के कई प्रोजेक्ट लटके हुए है। विभागों की बुरी कार्यप्रणाली का असर सभी विभागों की बजट खर्च रिपोर्ट पर पड़ रहा है।
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बजट खर्च रिपोर्ट के जरिए अमर उजाला इन विभागों की वास्तविकता को सामने लाएगा। सबसे कम बजट खर्च करने वाले ट्रांसपोर्ट विभाग से इसकी शुरुआत की जा रही है। 1 अप्रैल से 31 अगस्त 2016 तक की बजट खर्च रिपोर्ट में कई तथ्य निकलकर आए हैं।
बजट 60 करोड़, खर्च महज नौ करोड़ रुपये
शहर में ट्रांसपोर्ट सिस्टम को मजबूत करने के लिए सीटीयू को प्लान हेड के तहत इस बार 60 करोड़ रुपये का बजट मिला, लेकिन अप्रैल से अगस्त तक पांच माह में महज नौ करोड़ रुपये ही खर्च हो पाया है।
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वह भी किसी प्रोजेक्ट की बजाय सैलरी इत्यादि के मद में ही खर्च हुआ है। नई बसें खरीदना तो दूर पुरानी डील भी पूरी नहीं हो पाई हैं। सीटीयू ने कोरोना की 160 बसें खरीदने का करार किया था। इसमें से 11 ही मिल पाई हैं। इन 11 में कमियां उजागर होने के बाद बाकी बसों की खरीद अभी रुकी हुई है।
सीटीयू का अधिकतर बजट इन बसों की खरीद पर खर्च होना है, लेकिन कमियों की वजह से मामला अटका है। सिर्फ बसें ही नहीं ट्रांसपोर्ट सिस्टम को हाईटेक करने पर भी बजट खर्च होना है। इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम भी अभी अधर में है।
200 बसें खरीदने का प्रस्ताव तैयार
सीटीयू बस
- फोटो : file photo
लंबी दूरी के लिए 200 बसें खरीदने का प्रस्ताव तैयार हुआ है। इसमें 120 बसें एचवीएसी, 40 वोल्वो और 40 साधारण बसें शामिल हैं। यह सभी बसें लंबी दूरी के लिए खरीदी जानी हैं। लंबी जद्दोजहद के बाद प्रस्ताव तैयार हुआ है, अब खरीद कब शुरू होगी, यह तय नहीं हो पाया है। इस प्रोजेक्ट पर भी सीटीयू का मोटा बजट खर्च होगा।
ट्रांसपोर्ट विभाग की बजट खर्च रिपोर्ट
चंडीगढ़ ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग (सीटीयू) को रेवेन्यू प्लान बजट के तहत 21 करोड़ 27 लाख रुपये मिले। इसमें से सात करोड़ 23 लाख रुपये ही खर्च हो सके हैं। जो इसका 34 प्रतिशत बनता है। रेवेन्यू प्लान बजट में सैलरी इत्यादि आती हैं। इस कैपिटल प्लान बजट में प्रोजेक्ट इत्यादि आते हैं, उसमें तो स्थिति ज्यादा खराब है।
कैपिटल प्लान बजट के तहत 38 लाख 34 हजार रुपये का बजट मिला। इसमें से एक करोड़ 16 लाख रुपये ही खर्च हो सके। जो कुल रेवेन्यू बजट का महज तीन प्रतिशत ही बनता है।
रेवेन्यू और कैपिटल दोनों को मिलाया जाए तो दोनों का औसत खर्च 14.1 प्रतिशत ही बनता है। जबकि सितंबर तक औसत खर्च 50 प्रतिशत तक होना चाहिए। जबकि 200 करोड़ के नॉन प्लान बजट में से करीब 86 करोड़ रुपये यानी 43.21 प्रतिशत खर्च हुआ है।
सितंबर में रिवाइज्ड एस्टीमेट तैयार कर वित्त मंत्रालय को भेजना होता है। इसी के आधार पर बजट अगली छमाही और अगले साल का बजट तय होता है। पिछली बार बजट कम खर्च होने पर इसी रिपोर्ट के आधार पर प्लान हेड बजट में से 226 करोड़ रुपये काट लिए गए थे।
बसों की समय पर खरीद न होने का सीधा असर फ्रीक्वेंसी पर पड़ रहा है। लंबी दूरी की बसें न होने से 70 में से ज्यादातर रूट बंद हो चुके हैं। लोगों का सड़कों पर बसों का इंतजार कम नहीं हो रहा है। इतना ही नहीं पब्लिक ट्रांसपोर्ट मजबूत न होने से प्राइवेट गाड़ियों की तादाद सड़कों पर बढ़ रही है। इससे ट्रैफिक की समस्या बढ़ने लगी है।
बसों की खरीदारी में समय लगता है। कोरोना की 160 बसें खरीदी जानी हैं, लेकिन जो बसें अभी तक मिली हैं उनमें कुछ तकनीकी खामियां हैं। यह कमियां दूर होने के बाद ही बाकी बसें खरीदी जाएंगीं। सीटीयू का अधिकतर बजट बसों की खरीद पर ही खर्च होता है। जैसे ही बसें खरीद ली जाएंगी, बजट भी लग जाएगा। लंबी दूरी के लिए भी 200 बसें खरीदने का प्रस्ताव तैयार किया है। सिस्टम को स्ट्रीमलाइन करने की पूरी कोशिश की जा रही है।
- केके जिंदल, सेक्रेटरी, ट्रांसपोर्ट, चंडीगढ़