पंजाब में नशा बेलगाम है। सरकार भी इस बात को मानती है, लेकिन मुख्यमंत्री और उनकी टीम हाथ पर हाथ धरे बैठी है। यकीं नहीं आता तो देखिए ये रिपोर्ट। ये सीईसी की ताजा रिपोर्ट है। वर्ष 2016-17 के दौरान केंद्र सरकार ने ग्राम पंचायत विकास कार्यक्रम (जीपीडीपी) के तहत पंजाब को विशेष रूप से गांवों में नशे की रोकथाम और लिंगानुपात सुधारने के लिए फंड जारी किया था, लेकिन तत्कालीन अकाली-भाजपा सरकार ने इसमें कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके लिए न अनुभवी स्टाफ तैनात किया गया और न कार्यक्रम को लागू करने की कोई योजना ही बनाई गई।
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नतीजतन, कार्यक्रम निर्धारित लक्ष्य से भटक गया और केंद्र से मिला फंड भी पूरा खर्च नहीं हो पाया। जो कुछ खर्च हुआ वह भी केवल ग्राम जनप्रतिनिधियों की ट्रेनिंग पर हुआ, लेकिन इसका कोई फायदा सूबे को नहीं मिला। सीईसी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राज्य सरकार को कार्यक्रम के लिए वर्ष 2016-17 में केंद्र से मिले 2.69 करोड़ रुपये में से केवल 1.72 करोड़ रुपये ही खर्च हो पाए। इनमें से भी पंजाब सरकार ने 1.62 करोड़ रुपये ग्राम जनप्रतिनिधियों को ट्रेंड करने पर खर्च किए, लेकिन कोई योजना नहीं बना पाई और कार्यक्रम लक्ष्य से भटक गया।
जबकि इसके तहत जनप्रतिनिधियों के जरिए आम लोगों में जागरूकता लाकर नशे और अन्य समस्याओं से निपटने में भरपूर मदद मिल सकती थी। हालांकि सीईसी ने ही पंजाब सरकार को कहा था कि वह जीपीडीपी के तहत ग्राम जनप्रतिनिधियों को ट्रेंड करने को उच्च प्राथमिकता दें।
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सीईसी की सलाह तक नहीं मानी
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सीईसी का मानना है कि पंजाब में ज्यादातर पंचायतों का आकार काफी छोटा है, जिनमें लिंगानुपात और नशा विरोधी अभियान जैसी परियोजनाओं को पंचायतों द्वारा कम लागत और बिना खर्च के भी चलाया जा सकता है। नशे की रोकथाम और उसके उपचार के उपायों पर ग्राम सभाओं में चर्चा की जा सकती है। उसने पंजाब सरकार से ऐसे मामलों के लिए एक राज्यस्तरीय संसाधन पूल विकसित करने को भी कहा था, लेकिन राज्य सरकार ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
सीईसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्यक्रम के तहत नशे की रोकथाम को लेकर दी जाने वाली ट्रेनिंग में राज्य, जिला, ब्लाक व ग्राम स्तर पर जनप्रतिनिधियों को शामिल किया जाना अनिवार्य था। प्रस्तावित विषयगत ट्रेनिंग में नशे की रोकथाम, सैनिटेशन, सेहत, पोषाहार और लिंगानुपात को शामिल किया गया था। लेकिन पंजाब सरकार ने ग्राम जनप्रतिनिधियों को इस ट्रेनिंग से नशे की रोकथाम को दूर ही रखा।
नई सरकार में भी हालात जुदा नहीं
ड्रग्स स्मगलिंग
- फोटो : डेमो फोटो
पंजाब में अकाली-भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान नशा तस्करी और युवाओं में नशे की लत से निपटने के लिए कई उपाय किए गए। सीमा पार के नशे की सप्लाई काटने के प्रयास भी हुए और भारी मात्रा में नशा जब्त कर एनडीपीएस के तहत केस भी दर्ज हुए। सरकार ने युवाओं की नशे की लत छुड़ाने के लिए अस्पतालों में विशेष रूप से नशा उन्मूलन केंद्र खोले, जहां मुफ्त इलाज की सुविधा दी गई।
इस साल कांग्रेस सरकार के गठन के बाद राज्य में नशा तस्करी रोकने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स का गठन किया गया, जिसे सीधे मुख्यमंत्री के प्रति जवाबदेह बनाया गया। लेकिन इस प्रयास के साथ राज्य सरकार नशा उन्मूलन कार्यक्रम के लिए न तो बजट में प्रावधान कर सकी और न ही नशा केंद्रों में खाली पड़े विशेषज्ञों के पद भरे जा सके हैं।
जनवरी 2016 में अखिल भारतीय आयूर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की ओर से जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब में हर साल 7500 करोड़ रुपये का नशे का कारोबार होता है। यह कारोबार पंजाब से सटी भारत-पाक सीमा के जरिए हो रहा है। इस सर्वे में पंजाब के 10 जिलों को शामिल किया गया था। सर्वे के नतीजे बताते हैं कि इन जिलों में 2.77 करोड़ लोगों की आबादी है, जिसमें से 1.23 करोड़ लोग हेरोइन का इस्तेमाल करते हैं।
सर्वे में यह बात भी सामने आई कि लगभग 89 फीसदी शिक्षित युवा पंजाब में नशे के आदी हैं। औसतन एक व्यक्ति पंजाब में नशे पर 1400 रुपये रोजाना खर्च करता है। सबसे ज्यादा हेरोइन की खपत होती है, जो पंजाब के कुल नशे की 53 फीसदी है। इसके बाद डोडा/भुक्की की 33 फीसदी और 14 फीसदी नशीली दवाइयों की खपत है।