याची ने बताया कि यह पहला हादसा नहीं है जिसमें किसी पेड़ के कारण मुसीबत आई हो। इससे पहले 2013 में सेक्टर-17 में एक सूखे पेड़ के गिरने से 20 साल की युवती को टांग गंवानी पड़ी थी। उस समय हाईकोर्ट ने प्रशासन को युवती को 20 लाख 15 हजार रुपये मुआवजा जारी करने का आदेश दिया था। इसके बाद प्रशासन ने तीन सदस्यीय कमेटी बनाई थी, जिसे वृक्षों की पहचान कर उन्हें हटाने से जुड़े निर्णय लेने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
याची ने कहा कि इस हादसे के लिए कौन जिम्मेदार है, इसकी जांच हाईकोर्ट के वर्तमान जज को सौंपी जाए। इसके साथ ही भविष्य में ऐसे हादसे न हों इसके लिए एक कमेटी गठित की जाए, जो दिशा निर्देश तैयार करे। वहीं प्रशासन को पिछले पांच साल में वृक्षों की मेंटेनेंस, लोगों के लिए खतरनाक वृक्षों की पहचान से जुड़ा आंकड़ा सौंपने का आदेश दिया जाए।
क्लास में लंच की अनुमति नहीं, गर्मियों में वृक्षों की छाया ही बनती है विकल्प
याचिका में कहा गया कि स्कूल में विद्यार्थियों को कक्षा में खाने की अनुमति नहीं थी। विद्यार्थी वृक्ष की छाया में ही लंच करने को मजबूर थे। उस वृक्ष के पास खाना या बैठना सुरक्षित नहीं है, इस बारे में कोई बोर्ड तक नहीं लगाया गया था।
हादसा ईश्वर का कृत्य नहीं बल्कि लापरवाही का नतीजा
याची ने कहा कि इस हादसे को एक्ट ऑफ गॉड नहीं कह सकते। यह लापरवाही का नतीजा है। उस दिन न तो बारिश थी और न ही कोई तूफान आया था। यह हादसा 250 साल पुराने पेड़ में दीमक लगने से खोखला होने की वजह से हुआ था। शहर में बच्चों का ऐसे पेड़ों के नीचे होना खतरनाक है। ऐसे पेड़ों की पहचान कर लगातार निगरानी बेहद जरूरी है।