दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में हुए विवाद के बाद चर्चाओं में आई जालंधर की रहने वाली गुरमेहर कौर के पूरे प्रकरण पर देशभर से तरह तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। जहां कुछ लोग गुरमेहर कौर का विरोध कर रहे हैं वहीं समाज का एक तबका उनके साथ खड़ा है। गुरमेहर कौर शहीद कैप्टन मनदीप सिंह की बेटी हैं और दिल्ली यूनिवर्सिटी के लेडी श्रीराम कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई कर रही हैं। इस पूरे मामले पर रक्षा विशेषज्ञ और जाने-माने लेखक मेजर जनरल (रिटायर्ड) राज मेहता से चंडीगढ़ में खास बातचीत की रिशु राज सिंह ने-
सवाल: गुरमेहर कौर से जुड़े इस पूरे विवाद पर आपकी क्या राय है?
जवाब : जिस समय कैप्टन मनदीप सिंह की शहादत हुई, तब उनकी बेटी गुरमेहर कौर सिर्फ दो साल की थी। बहादुर विधवा राजविंदर कौर ने अपनी मासूम बच्ची को क्या बताना था कि पाकिस्तान ने उसके पिता को गोली मारी है, नहीं न। छोटी बच्ची थी अगर उस समय से ही उसको बोल दिया जाता कि पाकिस्तान ने मारा है, पाकिस्तान ने मारा है तो उसके दिमाग पर क्या असर पड़ता कोई सोच भी नहीं सकता। तो बहादुर मां ने बच्ची को यही बताया कि तुम्हारे पिता युद्ध में शहीद हो गए। अब किसी बच्ची को यह बताना कि उसके पिता की शहीदी युद्ध में हुई है, कोई पाप तो नहीं है न भाईसाहब।
सवाल: कैप्टन मनदीप की शहादत कैसे हुई?
जवाब: बात 6 अगस्त, 1999 की है। मध्यरात्रि करीब 1 बजकर 15 मिनट पर जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा के पास नतनूसा गांव में सेना के कैंप पर आतंकियों ने हमला कर दिया था। इसमें चार राष्ट्रीय राइफल यूनिट के सात लोग मारे गए, जिनमें से एक कंपनी कमांडर कैप्टन मनदीप सिंह भी थे। मंदीप सिंह को छाती में कई गोलियां लगी थीं, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। यह फौजी रिकार्ड में है।
सवाल : विवाद इस बात पर भी है कि मनदीप सिंह की शहादत कारगिल में नहीं हुई, ऐसा क्यों?
जवाब : इसकी सच्चाई क्या है मैं आपको बताता हूं। मैं घटनास्थल पर जा चुका हूं। कुपवाड़ा में और जहां कारगिल लड़ाई लड़ी गई दोनों के बीच करीब 150 किलोमीटर का फासला है। वो मौका और माहौल जिसमें मनदीप सिंह की शहादत हुई वो कारगिल के बाद चले ऑपरेशन विजय का था। जुलाई के अंत में कारगिल की लड़ाई खत्म हो गई थी लेकिन कम ही लोग इस बात को जानते हैं कि इस युद्ध के बाद एक ऑपरेशन चलाया गया जिसका नाम था ‘ऑपरेशन विजय’। इस ऑपरेशन में वो लोग जो राजस्थान में भी तैनात थे, उन्हें भी शहीदी के बाद कारगिल मेडल से ही सम्मानित किया गया। मतलब युद्ध कारगिल का ही था बस नाम बदल दिया गया था। गुरमेहर अगर कहती हैं कि उसके पिता कारगिल में शहीद हुए हैं, तो इसमें गलत क्या है।