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कैप्टन अमरिंदर सिंह बोले- पंजाब के किसान देशद्रोही नहीं, उनकी रोजी-रोटी खतरे में

Thu, 05 Nov 2020 03:12 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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कैप्टन अमरिंदर सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : एएनआई
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पंजाब के किसानों पर ‘राष्ट्र विरोधी’ होने के लगे आरोपों को खारिज करते हुए मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि वह केंद्र से टकराव के लिए दिल्ली नहीं आए हैं, बल्कि गरीब किसानों के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ने आए हैं, जिनकी रोजी-रोटी केंद्रीय कृषि कानूनों के कारण खतरे में पड़ गई है।

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मुख्यमंत्री ने कहा कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा संबंधी पंजाब की चिंता जाहिर करने के लिए राष्ट्रपति से मिलना चाहते हैं। राष्ट्रीय और खाद्य सुरक्षा के मुद्दों पर राष्ट्रपति को अवगत करवाना उनकी ड्यूटी बनती है। उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अपने पूर्ववर्ती प्रणब मुखर्जी की तरफ से पैदा की मिसाल के अनुसार इन पर सहमति दे देंगे, जिन्होंने अरुण जेतली के सुझाव पर धारा 254 के अंतर्गत भाजपा के शासन वाले राज्यों द्वारा पास विधेयक को मंजूरी दे दी थी।

धरना मोर्चाबंदी नहीं, देशवासियों को पंजाब के संकट से अवगत कराना
कैप्टन ने बताया कि भले ही उनका पहला प्रोग्राम राजघाट पर धरना देने का था परंतु बाद में इसे जंतर-मंतर शिफ्ट करना पड़ा, क्योंकि दिल्ली पुलिस ने राजघाट इलाके में धारा 144 लगा दी। राजघाट जाने के लिए मुख्यमंत्री के साथ केवल पंजाब के कांग्रेस सांसद ही उपस्थित थे, क्योंकि दिल्ली पुलिस ने केवल उन्हें ही जाने की इजाजत दी थी। 

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मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने अपने मिशन की शुरुआत राजघाट से करने का रास्ता इसलिए चुना है, क्योंकि महात्मा गांधी ने लाखों किसानों के साथ भारत की पहचान की थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कार्यक्रम पंजाब के विधायकों और संसद सदस्यों की तरफ से ‘मोर्चाबंदी’ नहीं है बल्कि राज्य को पेश संकट भारत के लोगों के ध्यान में लाने का प्रयास है।  

रोजी-रोटी पर लात मारोगे तो गुस्सा स्वाभाविक : कैप्टन
अमरिंदर ने कहा कि पंजाब का कोई भी नागरिक किसी भी देश विरोधी गतिविधि में शामिल होने के बारे में सोच भी नहीं सकता। किसी भी सरकार की तरफ से लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या उनकी रोजी-रोटी पर लात मारने जैसा कदम उठाने से गुस्सा और रोष पैदा होना स्वाभाविक है। किसान इसलिए प्रदर्शन कर रहे हैं, क्योंकि नए केंद्रीय कानून जहां उनको तबाह कर देंगे, वहीं उनके बच्चों के मुंह में निवाला छीन लेंगे।

हमने अपने देश के लिए कई बार खून दिया और आगे भी तैयार हैं। हम झगड़ा या टकराव नहीं चाहते हैं। हम 40 फीसदी अनाज एफसीआई (भारतीय खाद्य निगम) को देते हैं। हमारे किसानों के परिवारों पर संकट आए, उसको बर्दाश्त नहीं करेंगे। हरित क्रांति के पहले से हमारे यहां आढ़ती सिस्टम चल रहा है। किसान को जब भी जरूरत हुई उसे आधी रात को पैसे मिल जाते हैं। 
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सरकार इसे खत्म करना चाहती है। आखिर क्यों? आढ़ती की जगह कॉरपोरेट ले लेंगे तो हमारे किसानों की सुध कौन लेगा। केंद्र सरकार भाई-भाई का रिश्ता तोड़ रही है। किसानों के मसलों को हल करने में असफलता बेचैनी का कारण बनेगी। इसे देखते हुए चीन और पाकिस्तान भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेंगे।

किसानों का आलू खुले में पड़ा 
केंद्र का पंजाब के साथ सौतेला व्यवहार पूरी तरह गलत है। राज्य को मार्च महीने से जीएसटी की अदायगी नहीं की गई और सांविधानिक गारंटी का 10,000 करोड़ रुपये अब तक बकाया है। केंद्र की तरफ से आपदा राहत फंड भी बंद किया जा चुका है। पंजाब के पास पैसा नहीं है, उनके कोयले के भंडार खत्म हो गए हैं। ऐसी स्थिति में कैसे बचे रह सकते हैं?  हमारे राज्य में ट्रेनें बंद कर दी गई हैं। 

खाद नहीं मिलने से किसान बेहाल है। बारदाना नहीं पहुंच रहा है, जिससे किसानों का आलू खुले में पड़ा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि अकाली अपने राजनैतिक हितों के लिए केंद्रीय कानूनों पर पाखंड कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पंजाब में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले अकाली फिर से एक बार भाजपा के साथ हाथ मिलाएंगे।

रेल रोकना केंद्र सरकार की आर्थिक नाकाबंदी : सिद्धू
जंतर-मंतर पर, ‘किसान विरोधी कानून वापस लो’, ‘मजदूर-किसान एकता जिंदाबाद’ और ‘मोदी सरकार मुर्दाबाद’ के नारों के बीच सांसद मनीष तिवारी और विधायक नवजोत सिंह सिद्धू, लोक इंसाफ पार्टी के विधायक सिमरजीत सिंह बैंस, एकता पार्टी के सुखपाल खैहरा और शिरोमणि अकाली दल (डेमोक्रेटिक) के विधायक परमिंदर सिंह ढींढसा ने भी केंद्र की पंजाब और किसान विरोधी कार्रवाई की कड़ी निंदा की। सिद्धू ने रेल यातायात के निलंबन को केंद्र सरकार की ‘आर्थिक नाकाबंदी’ करार दिया और ढींढसा ने इस जंग को सफलतापूर्वक निष्कर्ष पर ले जाने के लिए लंबे संघर्ष का आह्वान किया।
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