पंजाब यूनिवर्सिटी टीचर एसोसिएशन (पुटा) ने शिक्षकों की वार्षिक सदस्यता शुल्क में ढाई गुना वृद्धि कर दी है। यही नहीं पीयू के एफडीओ से भी कह दिया गया कि बढ़ाया गया सदस्यता शुल्क सीधे शिक्षकों की सेलरी से काट लिया जाए। इसकी खबर लगते ही शिक्षकों में उबाल आ गया है। शिक्षकों ने आक्रोश जताते हुए कहा, सेलरी उनकी पर्सनल जिंदगी से जुड़ी है, उनकी अनुमति के बिना कैसे कटौती हो सकती है। इसको लेकर कई शिक्षकों ने पुटा अध्यक्ष व एफडीओ को पत्र लिखकर इस पर पुनर्विचार करने का कहा है।
साथ ही चेताया है कि मनमानी की गई तो मेंबरशिप तक लेने में हिचकेंगे। पुटा के मेंबर्स की संख्या लगभग 650 है। पीयू के अधिकांश शिक्षक इस संगठन से जुड़े हुए हैं। हाल ही में जनरल बॉडी मीटिंग यानी जीबीएम की गई। इसमें निर्णय लिया गया कि सालाना सदस्यता शुल्क 200 रुपये से बढ़ाकर 500 कर दिया जाए। 300 रुपये अचानक बढ़ाने की बात शिक्षकों को पता चली तो उन्होंने हाथ खींच लिए। सबसे अधिक उस बात से आक्रोशित हैं कि उनकी सेलरी अकाउंट से यह रकम काटी जाएगी।
अब तक सदस्यों से संपर्क कर लिया जाता था शुल्क
पिछले वर्षों तक परंपरा रही है कि पुटा के पदाधिकारी या कुछ टीम बनाकर सदस्यता शुल्क के लिए शिक्षकों के पास भेजी जाती थी। यह टीम शिक्षकों के सुख दुख जानती थी। समस्याओं का निराकरण करती थी। साथ ही शिक्षकों में कुछ गुस्सा किसी बात को लेकर होता था तो वह भी शांत करती थी। सदस्यता शुल्क भी महज 200 रुपये था जो देने में शिक्षक मनाही नहीं करते थे। अब सदस्यता शुल्क अचानक बढ़ाकर 500 कर दिया गया। साथ ही शुल्क शिक्षकों के पास जाकर लेने की बजाय उनकी सेलरी अकाउंट से काटे जाने के फरमान सुना दिए गए।
शिक्षक बोले- पुटा के पास कई एफडीआर, सार्वजनिक हो
शिक्षकों का आरोप है कि पुटा के खाते में पांच लाख से अधिक रुपये हैं। कई एफडीआर हैं। उनका ब्योरा शिक्षकों के सामने सार्वजनिक होना चाहिए, उसके बाद जरूरत पड़ने पर जायज शुल्क बढ़ाया जाना चाहिए। कई शिक्षकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वह इस बार पुटा की सदस्यता नहीं लेंगे। जीबीएम में कम सदस्य होते हैं और वह पूरे शिक्षकों के भविष्य के बारे में कैसे फैसला ले सकते हैं।
क्या है पुटा का काम
पुटा का काम शिक्षकों के हितों की रक्षा करना है। समय समय पर शिक्षकों को पदोन्नति दिलाना, किसी के साथ अन्याय हो तो उसे न्याय दिलाना, समय समय पर उनकी समस्याएं जानना और उनका निराकरण करने का काम होता है। यही नहीं सालाना गतिविधियां क्या होंगी, यह भी तय होता है।
जीबीएम में मिली है मंजूरी
पुटा ने वर्ष 2006 में सदस्यता शुल्क बढ़ाया था। अब पुटा के पास पैसे कम हुए तो वार्षिक सदस्यता शुल्क 200 से बढ़ाकर 300 किए जाने का प्रस्ताव जीबीएम में रखा था। कुछ सदस्यों ने शुल्क 500 रुपये किए जाने की बात रख दी और यह प्रस्ताव जीबीएम में पास हो गया। जीबीएम की मीटिंग में इस बार 100 से अधिक सदस्य थे। जीबीएम सर्वोच्च बॉडी है, वहीं से प्रस्ताव पास होते हैं।
- प्रो. राजेश गिल, अध्यक्ष पुटा
क्या कहते हैं शिक्षक
अचानक फरमान जारी करना तानाशाही
पुटा की ओर से बढ़ाया गया सदस्यता शुल्क गलत है। पुटा के खाते में पहले ही लाखों रुपये हैं, उसका हिसाब देना चाहिए और उसके बाद शुल्क जायज बढ़ाना चाहिए। अचानक फरमान जारी करना तानाशाही है। इससे शिक्षकों में आक्रोश है। शिक्षकों की पहले समस्या सुनते लेकिन ऐसा नहीं किया गया। हम इसका विरोध करते हैं। मैंने पुटा अध्यक्ष को इसके लिए पत्र भी लिखा है।
- प्रो. अजय रंगा, सीनेट मेंबर
शुल्क बढ़ाने गलत, पुनर्विचार हो
सदस्यता शुल्क बढ़ाना व खाते से पैसे काटना अलग अलग विषय हैं। सदस्यता शुल्क जो बढ़ाया गया है उसका मैं समर्थन नहीं करता। पहले शिक्षकों के पास जाकर सदस्यता शुल्क लिया जाता था, इस बहाने से उनकी समस्या जान लेते थे और नई योजनाओं के बारे में बताते थे, लेकिन इस नियम के तहत शिक्षकों से इंट्रेक्शन खत्म हो जाएगा। इस पर विचार होना चाहिए।
-- प्रो. एमसी सिद्धू, पूर्व पुटा सचिव
शिक्षकों की बात सुनी जानी चाहिए
पुटा की जिम्मेदारी बनती है कि वह सभी शिक्षकों को हर मामले में साथ लेकर चले और उनकी समस्याओं का हल करे। सदस्यता शुल्क बढ़ाने को लेकर जिन शिक्षकों ने असंतोष जताया है उन सभी की बात पुटा को सुननी चाहिए। शिक्षकों के हितों को ध्यान में रखकर आगे सोचा जाना चाहिए, ताकि समय से पुटा के चुनाव कराए जा सके। संयुक्त पुटा हम सबकी ताकत है।
- प्रो. देविंदर सिंह, पूर्व एसवीसी
शिक्षकों में पनप रहा असंतोष
पुटा जीबीएम की ओर से वार्षिक सदस्यता शुल्क 200 रुपये से बढ़ाकर 500 रुपये करना मेल नहीं खाता। इससे शिक्षकों में असंतोष पनप रहा है। इस पर विचार हो। साथ ही शिक्षकों की सेलरी उनकी पर्सनल लाइफ से जुड़ी है। ऐसे में बिना उनकी अनुमति के सदस्यता शुल्क नहीं काटा जा सकता। शुल्क लेने के लिए इंट्रेक्शन शिक्षकों के साथ किया जाना चाहिए था।
- प्रो. मुहम्मद खालिद, पूर्व पुटा अध्यक्ष