पंजाब यूनिवर्सिटी में मौजूदा वोटरों में छात्राओं की भागीदारी 58 फीसदी है। इसके बावजूद छात्र संगठनों की ओर से इस बार केवल तीन छात्राओं को ही उम्मीदवार बनाया गया है। चुनाव का पैनल घोषित हो चुका है और वोटिंग छह सितंबर को है। खास बात यह है कि 58 फीसदी गर्ल्स वोटिंग होने के कारण बिना छात्राओं के सपोर्ट के कोई छात्र संगठन जीत हासिल नहीं कर सकता लेकिन छात्र संगठनों ने केवल तीन महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर छात्राओं की अनदेखी की है। पीयू छात्रसंघ चुनाव में प्रेसिडेंट पद के लिए केवल एसएफएस ने ही महिला कैंडीडेट मैदान में उतारा है।
संगठन की ओर से कनुप्रिया को उम्मीदवार बनाया गया है। वहीं, एबीवीपी और एसएफपीयू गठबंधन ने वाइस प्रेसिडेंट पद के लिए बीडीएस की छात्रा हरआशीष चहल को चुनावी मैदान में उतारा है। वहीं नीति धीमान ज्वाइंट सेक्रेटरी के लिए चुनावी दंगल में खड़ी हैं। नीति धीमान सोई, इनसो, एचपीएसयू और आईएसएस के गठबंधन वाले पैनल से मैदान में उतरी हैं। नौ हजार गर्ल्स वोट होने के बाद सभी छात्र संगठनों की ओर से केवल तीन छात्राओं को चुनाव में उतारा गया है। इस तरह के हालात के बाद भी इस बार कोई गर्ल्स इंडिपेंडेंट कैंडीडेट चुनाव मैदान में नहीं है।
पिछले साल आठ छात्राएं थीं चुनावी मैदान में
वर्ष 2017 में पीयू के छात्रसंघ चुनाव में एसएफएस ने छात्रा हरमनप्रीत कौर को प्रेसिडेंट पद के लिए मैदान में उतार कर दांव खेला था। वहीं, वर्ष 2016 के चुनाव में एनएसयूआई ने सिया मनोचा को प्रधान पद के लिए टिकट दिया था, लेकिन वह जीत नहीं सकी थीं। वर्ष 2017 में एसएफएस के अलावा पुसू गठबंधन ने वाइस प्रेसिडेंट के लिए निधि लांबा, इनसो ने सचिव पद के लिए शैवलिनी सिंह, एनएसयूआई ने सचिव पद पर वानी सूद और संयुक्त सचिव के पद पर इज्या को मैदान में उतारा था। पीएसयू ललकार सिर्फ सचिव पद पर चुनाव लड़ी थी। छात्र संगठन की ओर से छात्रा अमनदीप कौर को उतारा गया था।
लड़कियों को प्रधान पद का उम्मीदवार बनाने से एसएफएस को छोड़कर सभी दल कतराते हैं। कई बार उम्मीदवारों को छात्राओं की अनदेखी के कारण हार का सामना करना पड़ता है। छात्र संगठनों का मानना है कि छात्राओं की ओर से बेहतर प्रचार-प्रसार नहीं करने के कारण पार्टियों को हार मिलती है। इस बार भी लड़कियों के वोट के माध्यम से चुनाव की दिशा तय होगी। सभी विभागों में मिलाकर नौ हजार छात्राएं पीयू में वोटर हैं। खास बात यह है कि छात्राओं की ओर से हर बार वोटिंग भी अधिक की जाती है। ऐसे में छात्राओं का वोट जिन्हें मिलेगा, जीत उनकी ही होगी।