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बजट 2020: आयकर के गुणा-भाग में उलझ गई जनता, विश्वविद्यालयों की अनदेखी से गिरेगी रैंकिंग

Sun, 02 Feb 2020 02:41 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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डॉ. गुरमीत सिंह, डॉ. सतीश वर्मा, डॉ. नवदीप गोयल - फोटो : अमर उजाला
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इस बार के बजट से शिक्षा को पंख नहीं लग पाएंगे। काम के बजट पर अधिक कैंची चलाई गई है। विश्वविद्यालयों के बजट में अधिक कटौती करके अनदेखी की गई है जबकि आईआईटी के बजट को बढ़ाकर उन्हें पहले पायदान पर रखा गया है। विश्वविद्यालय देश के विकास में बड़ा योगदान करते हैं। यहीं से युवा निकलकर देशसेवा के लिए बढ़ते हैं। सर्वाधिक ज्ञान का भंडार यहीं से आगे प्रचारित होता है। ऐसे में विश्वविद्यालयों के बजट पर कैंची चलाने से उनके विकास को प्रभावित करने की कोशिश हुई है। 

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राज्य विश्वविद्यालयों के विकास में राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान यानी रूसा सबसे अधिक भूमिका निभाता है। विकास के लिए इसके तहत करोड़ों रुपये विश्वविद्यालयों को जारी होते हैं। आंकड़ों को देखें तो पिछले साल रूसा के तहत 1380 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे और इस बार महज 300 करोड़ रुपये। यानी 1080 करोड़ रुपये की कटौती की गई है। ऐसे में आकलन किया जा सकता है कि विश्वविद्यालयों में पढ़ाई के अलावा अन्य विकास कार्य नहीं हो सकेंगे। जब विकास नहीं होगा तो उसका असर पढ़ाई पर पड़ेगा। विश्वविद्यालयों की रैंकिंग गिरेगी और एजेंसियों आदि के माध्यम से मिलने वाले फंड पर भी प्रभाव पड़ जाएगा। सरकार को रूसा के बजट को बढ़ाना चाहिए था लेकिन हुआ इसके उलट।

केंद्रीय विश्वविद्यालयों के बजट में भी इस बार 600 करोड़ की कटौती की गई। इससे वहां का इन्फ्रास्ट्रक्चर भी प्रभावित होगा। यानी विद्यार्थियों की बढ़ती आवश्यकताओं की पूर्ति वहां भी नहीं हो सकेगी। यूजीसी पर मेहरबानी अधिक की गई है। उसके बजट में 300 करोड़ का इजाफा किया गया है। यह रकम कहां पर खर्च होगी, अभी यह पाइप लाइन में है। स्टार्टअप, वर्ल्ड क्लास इंस्टीट्यूट के लिए पैसे आवंटित किए गए हैं जो कुछ ठीक हैं। 

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विदेशी विश्वविद्यालयों का ज्ञान यहां पहुंचे, इसके लिए हर विश्वविद्यालय फॉरेन कोलोब्रेशन करते हैं लेकिन इसके बजट में भी कैंची बड़ी चलाई गई। इसका बजट पिछले साल 112 करोड़ रुपये था जो घटाकर महज 40 करोड़ कर दिया गया। यह 40 करोड़ सैकड़ों विश्वविद्यालयों में आवंटित होगा, तो अंदाजा लगा सकते हैं कि किसके हिस्से में कितना आएगा। 

ज्ञान योजना के जरिए विशेषज्ञ ज्ञान बांटते हैं। यह भी एक बड़ा मंच है जो एक-दूसरे विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञ विद्यार्थियों के मध्य नई जानकारियां रखते हैं। इसका बजट 30 करोड़ था जो इस बार आधा कम करते हुए 15 करोड़ कर दिया गया। आईआईटी को बढ़ावा मिला है। शिक्षा का बजट कुछ प्वाइंट जरूर ओवरऑल बढ़ता दिखा लेकिन जहां अधिक खर्च होना चाहिए था वह आवंटित नहीं दिखता। हालांकि अभी बजट का विस्तृत रूप कुछ दिन में सामने आएगा। कुछ बातें और सार्वजनिक होंगी।  -डॉ. नवदीप गोयल, चेयरमैन फिजिक्स विभाग एवं फेलो, पंजाब विश्वविद्यालय

आयकर के गुणा-भाग में उलझ गई आम जनता
किसी भी बजट भाषण में आम जन विशेषकर हमारे जैसे नौकरीपेशा वर्ग की रुचि भाषण के सबसे अंत में आने वाले प्रत्यक्ष कर के प्रस्तावों या सीधे कहें तो आयकर को लेकर होती है। आज संयोग से वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन जब यह घोषणा कर रहीं थीं, तब मैं भी एक चैनल में बजट पर होने वाली चर्चा के लिए मौजूद था।

शुरू में जब वित्त मंत्री ने आयकर की दरों में कटौती का जिक्र करना शुरू किया तो सबके चेहरे पर एक आश्चर्य मिश्रित खुशी का भाव था लेकिन जैसे ही उन्होंने नई योजना में आयकर में मिलने वाली रियायतों को हटाने की बात कही तो वह भाव बदल गया। यहां तक तो फिर भी ठीक था लेकिन आगे आकर उन्होंने जब नई योजना के साथ पुरानी योजना का भी विकल्प खुला रहने की बात कही तो स्टूडियो में सब उलझ गए कि ये क्या हुआ। 

बस उसके बाद तो सबसे कागज पेन लेकर हिसाब-किताब में जुट गए कि नई योजना से लाभ है कि नुकसान। सबके आंकड़े भी अलग-अलग निकल रहे हैं। मुझे लगता है कि शायद आने वाले दिनों में स्थिति साफ हो लेकिन अभी तो ज्यादातर लोगों को वित्तमंत्री ने गुणा-भाग में उलझा ही दिया है। वैसे भी आयकर के स्लैब भी वित्तमंत्री ने बढ़ा दिए हैं, जिससे गुणा-भाग तो ज्यादा करना पड़ेगा। वैसे वित्त मंत्री ने बाद में कहा है कि नई योजना आयकर प्रणाली के सरलीकरण के लक्ष्य से बनाई है पर अभी तो दो-दो योजनाएं लागू होने से लोग उलझे हुए हैं। यह संभवत: पहली बार हुआ है कि आयकर की अदायगी के दो अलग अलग गणित लागू होंगे।

दूसरी बात इस बजट भाषण में साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते में मुझे ज्यादा अर्थपूर्ण लगी वह थी कि वित्त मंत्री द्वारा चुनी गई कविता, जिससे उन्होंने शुरुआत ही की। एक कश्मीरी पंडित दीनानाथ कौल की इस कविता के राजनीतिक मायने भी जरूर निकल रहे हैं, विशेषकर वर्तमान परिस्थितियों में। डल झील में कमल खिलने और युवाओं के गरम खून में प्यारे वतन को देखने की कवि की कल्पना तो भले कुछ और रही हो लेकिन राजनीति में सब कुछ इतना आसान नहीं होता। तभी तो डल झील में कमल खिलने की पंक्ति पर कैमरा गृहमंत्री अमित शाह पर विशेष रूप से फोकस कर रहा था और उनकी मुस्कान भी हम सबने नोटिस की।


पंजाब एंड महाराष्ट्र बैंक में हुए घोटाले और निवेशकों की आशंकाओं के मद्देनजर वित्त मंत्री ने बैंकों में जमा पूंजी के सुरक्षित होने की बात कहकर आम जन को आश्वस्त करने का प्रयास तो किया लेकिन साथ ही बैंक में जमा 5 लाख रुपये की गारंटी की बात से लोग आशंकित हुए हैं। यह सही है कि पहले तो यह गारंटी मात्र एक लाख रुपये की होती थी लेकिन अब यह चर्चा मात्र ही लोगों को परेशान कर सकती है। क्योंकि असली बात धारणा की होती है। देश में आमजन को बैंक में पैसा रखना सबसे सुरक्षित लगता था लेकिन वह विश्वास अब पहले जैसा रहा नहीं है।

चौथी और आखिरी बात, हम सब जानते हैं कि निजीकरण आज के युग की सच्चाई है। यह बात भी रेलवे, एलआईसी और शिक्षा आदि क्षेत्रों में इस बजट भाषण में शामिल प्रस्तावों से और पुख्ता हुई है। निजीकरण या विदेशी निवेश तब ज्यादा सार्थक हो सकता है। जब पहले से अपना ढांचा भी उसके मुकाबले जितनी ताकत रखता हो अन्यथा कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को ठेस लग सकती है। वैसे तो सबसे लंबे भाषण कहे जा रहे आज के बजट भाषण में कृषि और अन्य बुनियादी क्षेत्रों के लिए कई नई और बेहतर योजनाएं भी हैं लेकिन उन सबको धरातल में उतारने की चुनौती ही सबसे बड़ी होती है। - डॉ. गुरमीत सिंह, चेयरमैन, हिंदी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय  
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कुछ आंकड़ों में बजट ठीक मगर उलझाने वाला भी है

जीडीपी की ग्रोथ लगातार गिरती जा रही है। इसी बीच बजट में घोषणा कर दी कि अगले साल तक हम जीडीपी वृद्धि दर में 10 का आंकड़ा छू लेंगे। यह इसलिए कहा है कि कारपोरेट को टैक्स में कुछ छूट दी गई है लेकिन इस ओर ध्यान नहीं दिया कि इसका उपभोग कैसे होगा। उत्पादन करने से ही जीडीपी को पंख नहीं लगते, इसके लिए समग्र रूप से सोचना होगा।

जीडीपी तभी बढ़ सकती है जबकि निवेश भी अधिक हो और उपभोग भी। बजट में आए आंकड़ों से नहीं लग रहा कि उपभोग किसी तरह बढ़ने वाला है। एमएसएमई क्षेत्र के लिए बजट में राहत है। पहले शेयर खरीदारी पर डिविडेंट टैक्स फर्म पर लगता था लेकिन अब यह खरीदने वाले को देना पड़ेगा। यानी जिसको लाभ मिलेगा, वह देगा। इससे कारपोरेट क्षेत्र को लाभ मिलेगा। 

हालांकि इस बार परंपरागत बजट से हटकर कुछ पेश जरूर किया गया है। नयापन दिखाने की कोशिश हुई है। तीन बातों पर फोकस किया गया है। कृषि, सिंचाई, रूरल डेवलपमेंट, दूसरा-जनरल डेवलपमेंट और तीसरा रहने की सुविधा यानी हैप्पीनेस पर। वाटर सप्लाई पर सरकार अच्छा पैसा खर्च कर रही है। 3.4 लाख करोड़ रुपये इस पर खर्च हो रहे हैं। 

इसके अलावा उन क्षेत्रों पर सोलर एनर्जी से पानी पहुंचाया जाएगा, जो सूखे की चपेट में आते हैं। 20 लाख किसानों को सोलर पंप अनुदान पर दिए जाएंगे, इससे उन्हें लाभ मिलेगा। साथ ही गांवों में किसानों की सब्जी आदि स्टोरेज की व्यवस्था होने से किसानों की रीढ़ कुछ मजबूत होगी। बैंकिंग सेक्टर की मजबूती के लिए कुछ काम करने की बात सामने आएगी। जिन बैंकों पर विश्वास जनता का नहीं था अब वह बन जाएगा। उसकी गारंटी पांच लाख रुपये तक सरकार दे रही है। साथ ही इन बैंकों में पारदर्शिता भी बढ़ेगी। 

शिक्षा क्षेत्र का बजट कुछ बढ़ाकर 99 हजार करोड़ जरूर किया है लेकिन इसका लाभ तभी मिल पाएगा जब न्यू एजुकेशन पॉलिसी धरातल पर काम करेगी। हर इलाके में मेडिकल कॉलेज खोलने का प्रस्ताव ठीक है। कर्मचारियों के लिए टैक्स के स्लैब तीन से बढ़ाकर चार कर दिए गए हैं। इससे उलझन की स्थिति पैदा हुई है। 

पुराने स्लैब के मुताबिक वह लाभ लेंगे या नए के दायरे में आएंगे, यह क्लीयर नहीं है। टैक्स से तमाम लोग जुड़े हैं, इसका रास्ता साफ किया जाना चाहिए था जो दिख नहीं रहा। कौन सी योजनाएं धरातल पर आई हैं और कौन सी नहीं, इसका भी जिक्र नहीं किया गया। जो घाटे की बात की जा रही है उसकी पूर्ति सरकार कहां से होगी, यह भी सामने नहीं दिख रहा। बजट कुछ आंकड़ों में ठीक दिख रहा है लेकिन उलझाने वाला भी नजर आ रहा है। - डॉ. सतीश वर्मा, चेयर प्रोफेसर, आरबीआई चंडीगढ़
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