बहन के लिए भाई न रहा भाई, रिश्तों में खटास आई। बसपा सुप्रीमो मायावती और इनेलो के वरिष्ठ नेता एवं नेता प्रतिपक्ष अभय चौटाला पर यह युक्ति सटीक बैठ रही है। हरियाणा में नौ महीने 18 दिन पहले जब इनेलो और बसपा का चुनावी गठबंधन हुआ था तब चौटाला ने मायावती को बहन बताते हुए गठबंधन को रक्षाबंधन की तरह पवित्र करार दिया था।
अभय चौटाला ने कहा कि दोनों पार्टियों का गठबंधन भाई-बहन के मिलने जैसा है। बसपा नेता डॉ. मेघराज ने कहा था कि देश में बसपा सुप्रीमो मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की दिशा में यह गठबंधन आगे बढ़ेगा। लेकिन, भाई-बहन के रिश्ते ज्यादा दिन मधुर नहीं रह पाए। दस महीने से पहले न केवल उनमें खटास आई, बल्कि रिश्ते खत्म होने के कगार पर हैं।
रिश्ते राजनीतिक थे, जिका राजनीतिक परिदृश्य बदलने के साथ टूटना लाजिमी भी था। विपक्षी दल तो शुरू से ही गठबंधन टूटने का दम भर रहे थे, लेकिन जींद उपचुनाव से पहले तक यह कहीं नहीं लग रहा था कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के लिए हुआ गठबंधन उपचुनाव में गठबंधन प्रत्याशी की जमानत और बेहद करारी हार के एकदम बाद तार-तार हो जाएगा।
मायावती ने इनेलो के सामने गठबंधन बचाने की जो शर्त रखी है, उसका इनेलो के पास कोई तोड़ नहीं है। चूंकि, जजपा का इनेलो के साथ अब मेल होना फिलहाल नामुमकिन दिख रहा है। इसलिए लोकसभा चुनाव से पहले इनेलो और बसपा की राहें जुदा होना तय है। मायावती अपने मन की बात कह चुकी हैं, इनेलो के एक होने के आसार बेहद कम हैं, ऐसे में बसपा सुप्रीमो किसी भी समय गठबंधन तोड़ने का एलान कर सकती हैं।
बसपा के अलग होने से इनेलो को प्रदेश में तगड़ा झटका लगेगा, चूंकि, विधानसभा चुनाव में लगभग डेढ़ दर्जन सीटों पर उसे गठबंधन का फायदा होता दिख रहा था। पार्टी के साथ परिवार क्या टूटा बसपा ने भी अब किनारा करने का मन पूरी तरह से बना ही लिया है। ऐसे में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में इनेलो की राह कठिन होने वाली है। बुधवार को इनेलो की प्रदेश कार्यकारिणी की चंडीगढ़ में बैठक हो रही है, इसमें सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए पार्टी नई रणनीति बना सकती है ताकि कार्यकर्ताओं को एकजुट रखते हुए चुनावी दंगल में कूदा जा सके।