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सादिया की मौत का सच जानकर आपका दिल दहल जाएगा

Wed, 22 Apr 2015 05:42 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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रैबिज का शिकार हुई मासूम सादिया के इलाज में अगर शुरू में लापरवाही नहीं हुई होती तो उसे बचाया जा सकता था। बीते 25 मार्च को रैबिजग्रस्त कुत्ते ने चेहरे पर काटा था और वायरस दिमाग में पहुंचने का खतरा था। ऐसे में उसे जल्द से जल्द इलाज और ह्यूमन सीरम की जरूरत थी, मगर हेल्थ सिस्टम का चक्रव्यूह इतना जटिल था कि इलाज में जानलेवा देरी हुई।
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लापरवाही नंबर 1 : मनीमाजरा हॉस्पिटल ने किया मिस गाइड
कुत्ते के काटे जाने के बाद सादिया के परिजन सबसे पहले उसे मनीमाजरा के हॉस्पिटल ले गए। वहां पर डॉक्टरों ने उसे देखा और सीधे पीजीआई भेज दिया, जबकि डॉग बाइट के शिकार मरीज को सेक्टर 19 की डिस्पेंसरी में भेजा जाता है। यदि उसे यहां भेजा जाता तो तुरंत सीरम मिल जाता। क्लीनिक में सीरम मौजूद रहता है।

लापवाही नंबर 2 : पीजीआई में मदद कम, दौड़ाया ज्यादा
जब सादिया पीजीआई पहुंची तो वहां के डॉक्टरों ने ड्रेसिंग करने के बाद परिजनों को इम्युनोग्लोबिन सीरम लाने को कहा। इस सीरम की पूरे देश में शॉर्टेज है। परिजनों को यह भी नहीं बताया गया कि यह सीरम कहां मिलेगा। परिजन 25 मार्च सुबह 12 बजे से लेकर 7 बजे तक पूरे ट्राइसिटी के चक्कर लगाते रहे, लेकिन सीरम नहीं मिला। वापस लौटकर पीजीआई आए तो बताया गया कि अंबाला से लाओ। इस तरह सीरम देने में 12 घंटे लग गए। यह समय वायरस के लिए काफी साबित हुआ, वह अपना काम कर गया।
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लापरवाही नंबर 3 : सीरम आने के  ढाई घंटे बाद लगाया
परिजनों ने बताया कि 25 मार्च रात करीब 11 बजे सादिया के परिजन अंबाला से सीरम ले आए थे, लेकिन इसके बावजूद डॉक्टरों ने ढाई घंटे बाद सीरम लगाया। करीब 12.30 बजे बच्ची को सीरम लगाया गया। वह भी मेयर पूनम शर्मा के कहने पर। यदि मेयर नहीं आतीं तो शायद सीरम भी नहीं लगता। पीजीआई के डॉक्टरों ने इस मामले की गंभीरता को नहीं समझा।
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पीजीआई जैसे संस्थान के पास नहीं था सीरम

लापरवाही नंबर 4 : पीजीआई अपने को देश का नंबर दो का संस्थान बताता है, लेकिन उसके पास सीरम तक  नहीं था। यानी पीजीआई के कंसलटेंट का इस ओर ध्यान ही नहीं गया। यह बहुत बड़ी लापरवाही है। पीजीआई के पास पंजाब के भी काफी केस आते हैं और वहां पर रैबिज से संबंधित कई केस आते हैं। कुछ ने यह भी बताया कि जब डॉग बाइट के केस आते हैं तो पीजीआई की ओर से उन्हें सेक्टर 19 के क्लीनिक में भेज दिया जाता है। फिर सादिया के केस को पीजीआई ने क्यों नहीं भेजा।

डॉ. सिंगला के मुताबिक रिसर्च व डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइंस के मुताबिक सीरम व वैक्सिनेशन 24 घंटे के भीतर हो जानी चाहिए।  जब चेहरे पर डॉग बाइट है तो जितनी जल्दी हो सके सीरम का इस्तेमाल कर लेना चाहिए। हालांकि यह भी देखना होगा कि सादिया काफी छोटी थी। महज उसकी उम्र पांच साल थी।

इस हिसाब से उसकी वैक्सीनेशन और सीरम जल्दी लगा देना चाहिए था। रैबीज से मौत 21 दिन से लेकर 70 साल के बीच कभी भी हो सकती है। यदि निचले हिस्से में काटा होगा तो वायरस को ब्रेन तक पहुंचने में काफी समय लग जाता है। पहले वायरस नर्व में जाकर चिपक जाता है और फिर ब्रेन में।

वायरस को सिर्फ रोक सकते हैं, इलाज नहीं
देश में रैबिज के चार सरवाइवल केसों में से एक का इलाज करने वाले न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. फैज अहमद के अनुसार रैबिज के वायरस को हम सिर्फ रोक सकते हैं। इसका इलाज कोई नहीं है। डॉग बाइट यदि चेहरे या हाथ पर हो तो वायरस आसानी से ब्रेन तक पहुंच जाता है। सीरम अपना काम एक हफ्ते में शुरू करता है। पहले मरीज को वैक्सिनेशन दिया जाता है, ताकि इम्युनिटी बढ़े। उसके बाद सीरम का इस्तेमाल किया जाता है।

डॉ. एमआर सिंगला, पूर्व अधिकारी, पेट एनिमल सेंटर, पंचकूला ने बताया कि सादिया की उम्र मात्र पांच साल थी। कुत्ते ने उसे कान व होंठ पर काटा था। चेहरे से नसें सीधे दिमाग की ओर जाती हैं। वायरस मस्तिष्क तक न पहुंचे, इसके लिए जल्द से जल्द सीरम दिया जाना चाहिए था।
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