टेक्नोलॉजी के बढ़ते इस्तेमाल से आजकल लोगों की निजी जिंदगियों में अधिक दखलंदाजी शुरू हो गई है। कुछ लोग संभावित खतरों से बचने के लिए अपने बेटे, बेटियों, पति व पत्नी पर नजर रखने के लिए उनके मोबाइल फोन में जासूसी सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करा देते हैं। जिससे उन्हें दूसरे की हर गतिविधि की पल पल की जानकारी मिलती रहे।
जानकारों का कहना है कि मार्केट में ऐसी कई कंपनियां हैं, जो कि इस तरह के सॉफ्टवेयर और सर्विस देती हैं। जहां इस स्पाइवेयर को लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं वहीं इसका पुलिस - प्रशासन सही इस्तेमाल करे तो कई फायदे भी हैं।
स्पाईवेयर की जांच के लिए लोग प्राइवेट इंजीनियर के पास आते हैं। प्राइवेट सॉफ्टवेयर इंजीनियर राजेश राणा बताते हैं कि उनके पास हर महीने दो ऐसे केस तो आ ही जाते हैं। जिन्हें इस बात का शक होता है कि उनके मोबाइल में किसी ने स्पाईवेयर डाल रखा है। जिससे उनकी जासूसी हो रही है। राजेश बताते हैं कि अधिकतर कामकाजी महिलाएं उनके पास आती हैं। जिन्हें शक होता है कि उनके पति ने या घर के किसी व्यक्ति ने उनके मोबाइल में स्पाईवेयर डाल रखा है। जानकार बताते हैं कि जब घर में पति पत्नी में झगड़े हो जाते हैं या तलाक का केस चल रहा होता है। इससे पीड़ित लोगों को लगता है कि कहीं उनके पति या पत्नी ने मोबाइल में जासूसी के लिए कोई सॉफ्टवेयर तो नहीं डलवा रखा है।
महीने में 500 से 2000 रुपये लेती हैं कंपनियां
जानकार बताते हैं कि आप जासूसी के लिए जिस कंपनी का सॉफ्टवेयर मोबाइल में डालते हैं उसकी सर्विस के लिए 500 से 2000 रुपये तक देने पड़ते हैं। बाजार में ऐसे सॉफ्टवेयर उपलब्ध है कि उनको डलवाने के बाद व महीने की फीस चुकाने के बाद आप किसी की बातें व व्हाट्सएप चैटिंग तक की डिटेल हासिल कर सकते हैं। लेकिन उसके लिए जेब अधिक ढीली करनी पड़ती है।
आसानी से नहीं पता चलता स्पाईवेयर का
राजेश राणा बताते हैं कि मोबाइल में स्पाईवेयर इंस्टाल करने में आपको सिर्फ दस मिनट का ही समय लगता है। लेकिन अगर आपके मोबाइल में कोई स्पाईवेयर डाल दे तो आम मोबाइल यूजर्स के लिए उसका पता लगाना नामुमकिन होता है। अच्छे से अच्छे सॉफ्टवेयर इंजीनियर को भी स्पाईवेयर का पता लगाने में काफी समय लग जाता है।
स्पाईवेयर के फायदे भी हैं
टेक्नॉलिजी का अगर सही इस्तेमाल किया जाए तो इसके फायदे भी बहुत हैं। ज्यादातर परिजनों को अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बच्चे के मोबाइल में स्पाईवेयर डालते हैं। आपको उसकी लोकेशन का पूरा पता होता है। परिजनों को लगता है कि किशोरावस्था में ज्यादा तर बच्चे गलत संगत में पड़ जाते हैं। इस साफ्टवेयर से आप बच्चों पर नजर रख पाएंगे व उनको समय रहते गलत दिशा में जाने से पहले रोक सकेंगे। इससे किडनैपिंग जैसे मामलों को सुलझाने में बड़ी मदद मिलती है।
जीपीआरएस ऑन करने की जरूरत नहीं होती
आम राय है कि मोबाइल में जीपीआरएस तो होता ही है तो इसमें इस सॉफ्टवेयर की जरूरत क्या है। जीपीआरएस से भी लोकेशन का पता लग जाता है। लेकिन जीपीआरएस से लोकेशन का पता तभी लगता है जब जीपीआरएस ऑन हो। लेकिन अगर मोबाइल में ये साफ्टवेयर डाला हो तो जीपीआरएस को ऑन करने की जरूरत नहीं होती। स्पाईवेयर में जीपीआरएस होता है। बस मोबाइल पर इंटरनेट चलना चाहिए। जो इनदिनों हर स्मार्टफोन रखने वाले व्यक्ति के पास चलता ही है।
साइबर सेल के पास भी आते हैं ऐसे केस
यूटी पुलिस की साइबर सेल का कहना है कि लोग उनके पास भी शिकायत लेकर आते हैं कि उन्हें शक है कि उनका पति मोबाइल से उनकी जासूसी कर रहा है। क्योंकि जब पति पत्नी की आपस में नहीं बनती है तो वह एक दूसरे पर नजर रखनी शुरू कर देते हैं। उन्हें लगता है कि सामने वाले को कैसे पता लगेगा कि वह कहां और किसके साथ है। ज्यादातर औरतें ही इस तरह की शिकायतें लेकर आती हैं। कई बार तो इस तरह के सॉफ्टवेयर मोबाइल में इंस्टॉल मिले भी हैं। मगर बदनामी के डर से लोग केस दर्ज नहीं करवाते हैं।