सुखना लेक में प्रतिदिन बोर बेल के जरिये 75 लाख लीटर पानी भरे जाने को चुनौती देने वाली याचिका और मामले में हाईकोर्ट की ओर से लिए गए स्वत: संज्ञान का केस मंगलवार को सुनवाई के लिए एक ही बेंच के सामने पहुंची। जस्टिस एसएस सारों की खंडपीठ ने इन दोनों याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार करते हुए इसे पूर्व में झील से ही जुड़े स्वत: संज्ञान मामला सुन रही बेंच के पास वापस भेज दिया।
स्वत: संज्ञान वाली याचिका पर जस्टिस एके मित्तल की खंडपीठ ही सुनवाई कर रही थी। रोस्टर बदलने के बाद एक और जनहित याचिका दाखिल की गई, जो सुनवाई के लिए जस्टिस एसएस सारों की खंडपीठ के समक्ष आई थी। जस्टिस सारों ने यह जनहित याचिका मुख्य याचिका पर सुनवाई कर रही खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए रेफर कर दी थी। बावजूद इसके एक बार फिर सोमवार को दोनों याचिकाएं जस्टिस एसएस सारों की खंडपीठ के समख सुनवाई के लिए आ गई। जस्टिस सारों ने दोबारा यह याचिका अन्य खंडपीठ को रेफर कर दी है।
दीप्ती ने एडवोकेट रवि शर्मा के जरिये हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर कहा था कि शहर में पहले से ही पानी की कमी है। प्रशासन बोर बेल के जरिये भूजल से सुखना को भर रहा है। सुखना लेक में पेयजल को पाइप के माध्यम से भरे जाने का प्रशासन का फैसला नेशनल वाटर पॉलिसी 2002 के खिलाफ है। जबकि प्रशासन ने यह फैसला हाईकोर्ट में मुख्य याचिका पर सुनवाई के दौरान सुखना को भरने पर मांगे गए जवाब के बाद लिया था।