आप छोड़कर भाजपा में शामिल हुए अशोक तंवर अब पार्टी की मजबूती के लिए काम करेंगे। पूर्व आप नेता के आने से भाजपा को पार्टी में एक नया दलित चेहरा मिल गया है।
अंबाला के सांसद रतनलाल कटारिया के निधन के बाद से पार्टी को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी, जो उनकी कमी को पूरा करने के साथ पार्टी के लिए एक माहौल भी तैयार कर सके। पार्टी में सहकारिता मंत्री बनवारी लाल व राज्य सभा सांसद कृष्ण लाल पंवार जैसे बड़े चेहरे मौजूद हैं, फिर भी पार्टी को एक ऐसे नेता की तलाश में थी, जो हरियाणा में जाना पहचाना चेहरा हो और उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि भी मजबूत हो। इन समीकरणों में तंवर पार्टी के लिए पूरी तरह से फिट बैठे हैं।
19 फीसदी हैं दलित
हरियाणा में करीब 19 फीसदी दलितों की आबादी है। फिलहाल यह वोट बिखरा हुआ है। किसी समय में यह वोट बैंक कांग्रेस के पास होता था। मगर जाट व गैर जाट के समीकरण की वजह से यह वोट बैंक कुछ भाजपा व बसपा के पाले में है। पार्टी तंवर के बहाने दलित वोटों को अपनी ओर खींचने का काम करेगी। वह 2009 में कांग्रेस के टिकट पर सिरसा से सांसद चुनाव जीते थे। 2014 से लेकर 2019 तक प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं। 2019 में कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने कोई चुनाव नहीं लड़ा है।
2019 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने जजपा का समर्थन किया था। एलनाबाद उपचुनाव में इनेलो का समर्थन किया। उसके बाद तृणमूल कांग्रेस और फिर आम आदमी पार्टी में शामिल हुए। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक डा. सतीश त्यागी का कहना है कि तंवर के आने से भाजपा को ज्यादा फायदा नहीं होने वाला। जब वे कांग्रेस में थे तो उस दौरान कांग्रेस को कोई खास फायदा नहीं हुआ। हां यह जरूर है कि भाजपा ने एक माहौल जरूर बनाया है कि वह विपक्षी पार्टी का एक बड़ा नेता लाने में कामयाब रहे। हालांकि यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में पार्टी उन्हें क्या जिम्मेदारी देती है।
सुरक्षित सीट के लिए पार्टी चल सकती है दांव
ऐसी चर्चाएं हैं कि भाजपा तंवर को लेकर किसी सुरक्षित सीट पर दांव चल सकती है। वह सिरसा से सांसद रहे हैं और मौजूदा समय में पार्टी को सिरसा में ही सत्ता विरोधी लहर की आशंका दिख रही है। ऐसे में पार्टी सिरसा से नए चेहरे को उतारकर पार्टी सत्ता विरोधी लहर को कम कर सकती है। उल्लेखनीय है कि तंवर के आने से पहले पार्टी की मौजूदा सांसद सुनीता दुग्गल ने पार्टी प्रभारी बिप्लब कुमार देब से मुलाकात की थी।
इस मुलाकात के बाद यह चर्चा शुरू हुई कि दुग्गल ने तंवर की पार्टी में एंट्री का विरोध जताया है। हालांकि दुग्गल ने इससे साफ इन्कार कर दिया था। पार्टी सूत्रों ने यह भी दावा किया है कि तंवर को अंबाला लोकसभा सीट से भी उतारा जा सकता है। यह भी सुरक्षित सीट है। सांसद रतनलाल कटारिया के निधन के बाद से पार्टी को यहां से एक मजबूत उम्मीदवार की तलाश है, जो तंवर के रूप में पूरी हो सकती है। हालांकि पार्टी इस बार लोकसभा चुनाव में पांच नए चेहरे को उतारने की तैयारी में है।