कभी कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे बीरेंद्र सिंह अपने विरोधियों को पटकनी देने में आखिरकार कामयाब हो गए हैं। केंद्र की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि बीरेंद्र सिंह का भाजपा में जाने का निर्णय सही समय पर लिया गया है। पार्टी ने अपनी कथनी करनी में अंतर नहीं दिखाते हुए बीरेंद्र सिंह का कद तो बढ़ाया ही है।
साथ ही एक तीर से दो निशाने साधने का काम किया है। बीरेंद्र सिंह के राजनीतिक अनुभव को पार्टी पड़ोसी राज्यों में भुनाने का काम करेगी। दिल्ली और उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा नवनियुक्त केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह को अहम जिम्मेदारी दे सकती है।
हरियाणा से सटी बाहरी दिल्ली की करीब एक दर्जन सीटों पर जाट मतदाता बड़ी संख्या में हैं। कांग्रेस में रहते हुए बीरेंद्र सिंह दिल्ली और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों के प्रभारी रहे हैं। इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट मतदाताओं को लुभाने का काम भी भविष्य में बीरेंद्र सिंह के कंधों पर डाला जाएगा।
सिर्फ गैर-जाट राजनीति न करने के संकेत
दूसरी तरफ भाजपा ने सिंह को मंत्रिमंडल में शामिल कर इस बात के संकेत भी दे दिए हैं कि भाजपा हरियाणा में सिर्फ गैर जाट की राजनीति नहीं करेगी। हरियाणा में भाजपा ने मुख्यमंत्री गैर जाट को बनाया है तो केंद्र में मंत्री हरियाणा के कद्दावर जाट नेता को बना दिया है।
हालांकि कांग्रेस में रह कर कई बार बीरेंद्र सिंह को ट्रेजडी का शिकार होना पड़ा है। भाजपा की रैली में उन्होंने मंच से भी इस बात का जिक्र किया था। इसके बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि बीरेंद्र सिंह को पार्टी में पूरा मान सम्मान दिया जाएगा।
राजीव गांधी की हत्या के बाद सीएम नहीं बने:
कांग्रेस में कई बार ट्रेजडी का शिकार हुए बीरेंद्र सिंह का मुख्यमंत्री बनना तय था। 1991 में उनका मुख्यमंत्री बनना तय था। लेकिन राजीव गांधी की हत्या होने के कारण उनका पत्ता कट गया। 1991 में भजनलाल को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिल गया। उसके बाद से बीरेंद्र सिंह हाशिए पर आ गए।
जो 40 साल में नहीं मिला वो 3 महीने में मिला
बांगर के चौधरी बीरेंद्र सिंह को कांग्रेस में 40 साल रहकर भी जो नहीं मिल पाया, वह भाजपा में शामिल होने के तीन महीने में ही मिल गया। चौ. बीरेंद्र सिंह ने रविवार को मोदी की टीम में कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली।
कांग्रेस के बैनर तले प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की चाह अधूरी रहने के बाद इस साल 16 अगस्त को उन्होंने जींद रैली में भाजपा का दामन थामा था। भाजपा ने हरियाणा और दिल्ली में जाट समुदाय को ध्यान में रखते हुए उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया है।
कांग्रेस में वित्त मंत्री बन करना पड़ा संतोष
2005 में हरियाणा में कांग्रेस की सरकार बनी। लेकिन बीरेंद्र सिंह को वित्त मंत्री बनकर संतोष करना पड़ा। 2009 में मुख्यमंत्री बनने का सपना संजोए बीरेंद्र सिंह को इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला से मात मिली। उन्होंने अपनी हार का ठीकरा भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर लगाया।
कांग्रेस ने भी बढ़ाया था कद:
इसके बाद कांग्रेस ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाते हुए दिल्ली, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश का प्रभारी बनाया। उत्तराखंड और हिमाचल में कांग्रेस सरकार बनी, फिर भी महासचिव पद से उनकी छुट्टी कर दी गई। हालांकि राज्यसभा सदस्य रहते हुए उन्हें सीडब्ल्यूसी का मेंबर बनाया गया।
ट्रेजडी किंग बन चुके थे चौधरी
प्रदेश की राजनीति में चौधरी बीरेंद्र सिंह ट्रेजडी किंग ही बन चुके थे। वर्ष 1972 में उन्होंने नरवाना विधानसभा सीट से पहली चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। उस समय वे जींद कांग्रेस की युवा इकाई के प्रधान थे। वर्ष 1977 में उन्होंने उचाना से चुनाव लड़कर पहली जीत हासिल की।
1982 में वे फिर उचाना से चुनाव में उतरे और विधायक बने। तब वे राज्य के कोऑपरेटिव एवं डेयरी विकास मंत्री बने। वर्ष 1987 में उन्होंने लोकसभा का रुख किया और हिसार लोकसभा सीट से चुनाव जीते। 1991 में उन्होंने फिर उचाना से विधानसभा चुनाव लड़ा और जीतकर राजस्व मंत्री का ओहदा हासिल किया। वर्ष 1996 में तिवारी कांग्रेस से भी चुनाव लड़कर उन्होंने जीत हासिल की।
वर्ष 2000 के चुनाव में हार के बाद वे 2005 में उचाना से जीते और राज्य से वित्त मंत्री बने। वर्ष 2009 में वे इनेलो सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला से चुनाव हारे तो कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेजा। वे उत्तराखंड, दिल्ली और हिमाचल में पार्टी प्रभारी एवं महासचिव भी रहे। 2014 में उन्होंने प्रदेश कांग्रेस में बगावत का झंडा बुलंद कर दिया।
पार्टी द्वारा उनकी मांगे नहीं माने जाने पर वे कांग्रेस को अलविदा कहकर भाजपा में आ गए। लेकिन उन्होंने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा तो भाजपा ने उनकी पत्नी को उचाना से टिकट दिया, जिस पर वे विजयी रहीं।