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Chandigarh News: हरियाणा में किसान आंदोलन के करंट से भाजपा को बड़ा झटका, कांग्रेस को लगी लॉटरी

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-भाजपा से नाराज किसानों को साधने में कामयाब रही कांग्रेस, आंदोलन को जाति विशेष से जोड़कर देखना भाजपा को पड़ा भारी
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सोमदत्त शर्मा
चंडीगढ़। लोकसभा चुनावों में किसान आंदोलन पूरा करंट हरियाणा में देखने को मिला। किसानों ने सत्तारूढ़ दल भाजपा का खुले तौर पर न केवल विरोध किया, बल्कि इस नाराजगी को मतदान में भी बदलने का काम किया। विकल्प के तौर पर किसानों ने कांग्रेस का साथ दिया। सिरसा, हिसार, अंबाला, रोहतक और सोनीपत लोकसभा सीटों पर कांग्रेस की जीत इसी का परिणाम हैं। इनके अलावा, शेष सीटों पर भी कांग्रेस के प्रत्याशियों ने भाजपा को इसी फैक्टर के दम पर कड़ी टक्कर दी है। यूं तो प्रदेशभर की दसों लोकसभा सीटों पर किसान आंदोलन का असर रहा। इसके चलते, पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा प्रत्याशियों का जीत का अंतर इतना बड़ा नहीं रहा। दूसरा, भाजपा की दसों सीटों में से पांच को कब्जाने में कांग्रेस कामयाब रही। लोकसभा चुनावों से पहले ही हरियाणा की खुफिया एजेंसी ने सरकार को किसान आंदोलन के बारे में रिपोर्ट दी थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि हिसार, सिरसा, रोहतक, सोनीपत, कुरुक्षेत्र, करनाल और अंबाला संसदीय क्षेत्रों में किसान आंदोलन फैक्टर का असर दिख सकता है। क्योंकि, हिसार और सिरसा में तो किसानों ने खुले तौर पर भाजपा और जजपा नेताओं को विरोध किया और उन्हें गांवों तक में नहीं घुसने दिया। लोकसभा चुनावों के परिणाम भी खुफिया विभाग विभाग की रिपोर्ट पर मुहर लगा रहे हैं। कांग्रेस की झोली में आई सीटों के अलावा कुरुक्षेत्र, भिवानी-महेंद्रगढ़ सीट पर भी किसान आंदोलन का असर दिखा है। क्योंकि कुरुक्षेत्र भी किसान आंदोलन का गढ़ रहा है यह भाकियू के राज्य प्रधान गुरनाम सिंह चढ़ूनी का गढ़ माना जाता है। केवल करनाल सीट ऐसी है, जहां पर किसान आंदोलन का असर कम रहा है, एक तो यहां पर दो बार के मुख्यमंत्री रहे मनोहर लाल प्रत्याशी थे और दूसरा यहां पर उनके मुकाबले कांग्रेस का बिलकुल नया चेहरा मैदान में था। हालांकि, पिछली बार के मुकाबले मनोहर लाल की जीत काफी कम है, क्योंकि यहां से पिछली बार संजय भाटिया साढ़े छह लाख वोटों से जीते थे। गौर हो कि 2020-21 में हुए किसान आंदोलन की शुरुआत अंबाला से हुई थी और अंबाला इसका गढ़ रहा। यहां से कुरुक्षेत्र, करनाल, सोनीपत भी आंदोलन से प्रभावित रहे थे। जींद, कैथल, रोहतक, झज्जर, सोनीपत और पानीपत जिलों में भी किसान आंदोलन का पूरा असर रहा था।
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कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित हुआ किसान आंदोलन
किसान आंदोलन हरियाणा में कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित हुआ है। आंदोलन की शुरुआत से लेकर अब तक कांग्रेस ने खुलकर किसानों का समर्थन किया है। राजनीतिक विश्लेषक डाॅ. सतीश त्यागी का मानना है कि अब लोकसभा चुनावों में इतनी सीटें मिलने पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नए जोश का संचार हुआ है। वह अब विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुटेंगे।
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रिपोर्ट मिलने पर भी किसानों को मना नहीं पाई भाजपा
लोकसभा चुनावों से पहले ही खुफिया रिपोर्ट मिलने के बाद भी भाजपा ने किसानों को मनाने के लिए कोई ठोस रणनीति तैयार नहीं की। उल्टा, इस आंदोलन को केवल एक जाति विशेष से जोड़कर देखा गया। भाजपा यहीं पर गलती कर गई, क्योंकि गांवों में किसी एक जाति विशेष नहीं बल्कि तमाम जातियों के लोगों ने आंदोलन में हिस्सा लिया था। किसानों पर किए गए लाठीचार्ज को लेकर विपक्षी दल लगातार सरकार को घेरते रहे, लेकिन इसकी काट में किसानों को साधने के लिए सरकार कुछ नहीं कर पाई।
बेरोजगारी, महंगाई और ओपीएस जैसे मुद्दे ने भी प्रभावित किया

किसान आंदोलन के अलावा, हरियाणा में महंगाई, बेरोजगारी भी मुद्दे रहे हैं। बेरोजगारी में हरियाणा देशभर में सबसे ऊपर है, दो लाख सरकारी पद खाली पड़े हैं। नौकरियों के लिए घूम रहे युवा सरकार से नाराज दिखे। बड़ा फैक्टर कर्मचारियों का भी रहा। राज्य के ढाई लाख से अधिक कर्मचारी अपनी मांगों और ओल्ड पेंशन स्कीम (ओपीएस) को लेकर सरकार से नाराज हैं। परिणामों से पहले ही मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल इसको लेकर कई कर्मचारियों और अधिकारियों को निशाने पर ले चुके हैं। कच्चे कर्मचारियों ने भी मतदान के जरिये अपनी नाराजगी जाहिर की है। क्योंकि चुनावों से पहले कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने की बात चली थी, लेकिन सरकार इस पर कोई ठोस फैसला नहीं ले पाई। वहीं, सरपंचों के विरोध आंदोलन का असर दिखा।

पीपीपी और प्राॅपर्टी आईडी भी रहे मुद्दे
चुनाव में हरियाणा सरकार के फैसले भी हावी रहे। इनमें परिवार पहचान पत्र (पीपीपी) और प्राॅपर्टी आईडी के मुद्दे रहे। दोनों ही मामलों में जनता को परेशानी उठानी पड़ी है। परिवार पहचान पत्र में आय का आंकड़ा कम या ज्यादा होने से लोग परेशान रहे और इनको ठीक कराने के लिए कार्यालयों केे धक्के खाते रहे। यही हालात प्राॅपर्टी आईडी को लेकर रहे। आईडी बनाने में कंपनी द्वारा भारी गड़बड़ी की गई और इसका खामियाजा आम जनता को उठाना पड़ा। दोनों ही योजनाओं में आई दिक्कतों का गुस्सा लोगों ने मतदान करके निकाला।

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हरियाणा सरपंच एसोसिएशन का दावा जैसे कि चुनाव से ठीक पहले सरपंच एसोसिएशन ने मीटिंग करके प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र में भाजपा के विरोध का एलान किया था और इंडिया गठबंधन का साथ देने का फैसला लिया था। परिणाम सामने हैं। अब हमारा लक्ष्य भाजपा को प्रदेश की सत्ता से बेदखल करने का है। पंचायतों के अधिकार छीनने वालों और सरपंचों का अपमान करने वालों को जनता कभी माफ नहीं करेगी।
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रणबीर समैण, प्रदेशाध्यक्ष, सरपंच एसोसिएशन हरियाणा

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ये किसान आंदोलन की जीत है। हरियाणा के परिणामों से साफ है कि प्रदेश का हर आम किसान सरकार के फैसलों और उनके रवैये से आहत है। किसानों के साथ भाजपा ने जो आंदोलन के समय किया था, ये उसी का परिणाम है। ये तो शुरुआत है,. आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को सत्ता से बाहर किया जाएगा।
-रतन मान, प्रदेशाध्यक्ष, भाकियू।
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