केंद्र सरकार चहेतों के हितों की रक्षा करने वाली नीतियों को लागू करने के लिए देश के माहौल को अपने अनुसार ढाल रही है। महामारी के नाम पर लोगों की जुबान बंद की जा रही है। लेकिन वर्तमान में देश के महान शहीदों की सोच को आगे बढ़ाने की जरूरत है और संयुक्त संघर्ष मोर्चा इसके लिए पीछे नहीं हटेगा।
प्रदेश का समूचा नौजवान वर्ग किसानों के संघर्ष में साथ दे रहा है। नारी शक्ति भी पीछे नहीं है और हर मोर्चे में महिलाएं योगदान दे रही हैं। कृषि कानूनों को वापस लेने तक आंदोलन जारी रहेगा। वक्ताओं ने कहा कि शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को शहीद ऊधम सिंह की जन्मभूमि पर श्रद्धांजलि देने से नई ऊर्जा पैदा हुई है।
युवाओं ने भगत सिंह व ऊधम सिंह की दोस्ती को किया सजदा
शहीद ऊधम सिंह की जन्मभूमि सुनाम में सूबे भर से आए नौजवानों ने देश के दो महान शहीदों की दोस्ती को सजदा किया। शहर के मुख्य बाजारों में शहीदों की तस्वीरें लेकर युवाओं ने श्रद्धांजलि भेंट की और केंद्र की नीतियों के खिलाफ नारेबाजी की। ऊधम सिंह के जीवन पर भगत सिंह की इतनी गहरी छाप थी कि फांसी का फंदा चूमने से कुछ दिन पहले उन्हें फांसी की चिंता नहीं थी, बल्कि फांसी होने से अपने बिछडे़ दोस्त (भगत सिंह) से मिलने को लालायित थे।
23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव सिंह को ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी दी थी। जबकि ऊधम सिंह ने 13 मार्च 1940 को लंदन में माइकल ओड्वायर को मार गिराया था। 23 मार्च 1940 के दिन ऊधम सिंह, लंदन की जेल में थे और इस दिन उन्होंने कुछ भी नहीं खाया-पीया। किसी से बातचीत भी नहीं की थी। बल्कि एक पत्र के माध्यम से भगत सिंह के प्रति जज्बात का इजहार किया था।
ऊधम सिंह ने इस पत्र में लिखा था कि उन्हें उम्मीद है कि मेरे दोस्त की तरह मुझे भी रात के वक्त ही फांसी दी जाएगी। यह 23 मार्च की बात है और आशा है कि मेरा दोस्त भी मुझसे मिलने की इच्छा रखते होंगे। भगत सिंह व ऊधम सिंह, साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ थे और आजादी के बाद मुल्क को खुशहाल देखना चाहते थे।