इसका पूरा नाम है बेसिलस कामेट गुएरिन। यह टीबी और सांस से जुड़ी बीमारियों को रोकने वाला टीका है। बीसीजी को जन्म के बाद से छह महीने के बीच लगाया जाता है। दुनिया में सबसे पहले इसका 1920 में इस्तेमाल हुआ। भारत में इसका टीकाकरण अनिवार्य है।
बीसीजी का टीका ऐसे करता है काम
इस टीके में बैक्टीरियम की वे स्ट्रेन्स होती हैं जो इंसानों में फेफड़ों की टीबी का कारण है। इस स्ट्रेन का नाम मायकोबैक्टिरियम बोविस है। टीका बनाने के दौरान एक्टिव बैक्टीरिया की ताकत घटा दी जाती है ताकि ये स्वस्थ लोग को बीमारी न कर सके। इसे मेडिकल की भाषा में एक्टिव इनग्रेडिएंट कहा जाता है। इसके अलावा वैक्सीन में सोडियम, पोटेशियम और मैग्नीशियम साल्ट, ग्लिसरॉल और साइट्रिक एसिड होता है। टीबी से बचाने के लिए जन्म से 15 दिन के भीतर बच्चे को बीसीजी का टीका लगाया जाता है। यह टीका कई और संक्रामक बीमारियों से भी बच्चे को बचाता है।
कोविड की मारक क्षमता कम करता है बीसीजी
अध्ययन में यह बात सामने आई है कि भारत और चीन जैसे देश, जहां के राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में बीसीजी शामिल है, वहां कोरोना से मृत्यु दर कम रहा है। टीकाकरण वाले देशों में संक्रमण की रफ्तार कम होने के साथ ही रिकवरी रेट ज्यादा है। यह टीका रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर वायरल इंफेक्शन से बचाव में सहायक साबित होता है।
विकसित देश रह गए पीछे
अध्ययन में बीसीजी के परिणामस्वरूप विकसित देश विकासशील देश से पीछे नजर आ रहे हैं। यूके, इटली, स्पेन, अमेरिका की जनता में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम और भारत, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, बांग्लादेश में ज्यादा मिली है।
इन्होंने किया अध्ययन
पीजीआई के न्यूरोलॉजी व फार्माकोलॉजी विभाग के डॉ. केआर शर्मा, डॉ. जी बत्रा, डॉ. एम कुमार, डॉ. ए मिश्रा, डॉ. आर सिंगला, डॉ. ए सिंह, डॉ. आर एस सिंह और डॉ. बी मेबी शामिल हैं।
- बीसीजी को लेकर विश्वभर में अध्ययन चल रहा है। पीजीआई के डॉक्टरों ने भी इस पर अध्ययन किया है। इसका सकारात्मक परिणाम आया है। प्रो. जगतराम, निदेशक पीजीआई चंडीगढ़।