जय जवान जय किसान के नारे को सार्थक करने वाले पंजाब की 21वीं सदी की शुरुआत में सेना में भागीदारी न के बराबर रह गई थी। इसे सुधारने का जिम्मा रिटायर्ड मेजर जनरल जीएस ग्रेवाल को दिया गया। ग्रेवाल ने महाराज रणजीत सिंह आर्म्ड फोर्सेस प्रिपेटरी इंस्टीट्यूट (एएफपीआई) के जरिए सेना में पंजाब की शान लौटाने का काम किया।
2010 में सेना में पंजाब के ऑफिसर्स की भागीदारी महज 2 प्रतिशत रह गई थी, लेकिन ग्रेवाल के प्रयासों से आज अकेले एएफपीआई की भागीदारी ही करीब 10 प्रतिशत हो गई है। सैन्य परिवार में जन्मे जीएस ग्रेवाल ने पटियाला के वाईपीएस से 10वीं तक की शिक्षा ली। 1968 में वह एनडीए के लिए चयनित हुए। 1971 में बतौर लेफ्टिनेंट उन्होंने सेना में कमीशन हासिल किया।
खास बात यह रही कि ग्रेवाल ने अपने पिता की रेजिमेंट हाट्स एन हार्स में ही बतौर सैन्य अधिकारी अपने कॅरिअर की शुरुआत की। 1992 में इस रेजिमेंट को उन्होंने कमांड किया। 2010 में रिटायर होने से पहले दो साल वह नेशनल डिफेंस अकादमी (एनडीए) के चीफ इंस्ट्रक्टर रहे।
हर साल संस्थान के 25 से अधिक बच्चे एनडीए में जा रहे
बता दें कि हर साल करीब 6 लाख युवा एनडीए की परीक्षा में बैठते हैं, जिनमें से 300 ही चयनित होते हैं। एएफपीआई के 47 छात्र आर्मी, 5 नेवी और 6 एयरफोर्स में बतौर अधिकारी अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इंस्टीट्यूट हर साल 40-45 बच्चों को सिखलाई देता है और इनमें से औसतन 25 से ज्यादा स्टूडेंट्स हर साल एनडीए के लिए चयनित हो रहे हैं।