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जज्बे को सलामः 26 साल से हाईकोर्ट में चंडीगढ़ की पैरवी कर रही, मकसद सिर्फ जन कल्याण

Fri, 11 Jan 2019 02:47 PM IST
खुशबू गोयल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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एडवोकेट रीटा कोहली
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की सीनियर एडवोकेट रीटा कोहली शहर की जानी-मानी शख्सियत हैं। रीटा कोहली हाईकोर्ट में कई बड़े मामलों में शहर की पैरवी करती रही हैं। ट्रैफिक वॉयलेशन, वल्गर सांग, नाइट फूड स्ट्रीट, जेलों में कैदियों की हालत और ड्रग्स जैसे कई मामलों में रीटा कोहली ने अहम भूमिका अदा की है। इनके अलावा वह कई सामाजिक संस्थाओं से जुड़ी हुई हैं, जो लोक भलाई के कार्य करती हैं।
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कोहली पंजाब यूनिवर्सिटी की सेक्सुअल हरासमेंट कमेटी की सदस्य भी हैं। रीटा कोहली का व्यवहार ऐसा है कि जो भी उनसे मिलता है, उनकी विनम्रता का कायल हो जाता है। 26 साल के वकालत के कैरियर में वह 17 साल पंजाब एजी ऑफिस में कार्यरत रहीं। सरकारी वकील रहते कई बार उन्होंने सरकार के खिलाफ जाकर लोगों के लिए कार्य किया हैं।

सवाल- विज्ञान से वकालत का सफर कैसा रहा?
जवाब-
परिवार में कोई वकील नहीं था। एमएससी बॉयो केमिस्ट्री ऑनर्स करने के बाद वकालत की। कोई इरादा न होते हुए वकालत में आ गई। सही समय पर अच्छे लोगों ने राय दी और अब ऐसा लगता है कि मैं वकालत के ही लिए बनी थीं। अगर मैं आज वकील नहीं भी होती तो कहीं न कहीं सोशल वर्क में लगी होती।
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सवाल- 26 साल के दौरान वकालत में क्या फर्क आया?
जवाब-
हमारे समय पर जब कोई सीनियर वकील कोर्ट में आता था तो जूनियर्स कभी सोच नहीं सकता था कि सीनियर खड़ा रहे और वह बैठ जाए। सम्मान देने की भावना खत्म होती जा रही है। अब वकालत में जो युवा आ रहे हैं, उन्हे केस पढ़ने से ज्यादा इस बात की फिक्र होती है कि चेक कितने का आया, जबकि उनमें सीखने की ललक होनी चाहिए, क्योंकि यही आदत उन्हें दूर तक ले जा सकती है। आज का युवा यूज एंड थ्रो में विश्वास करता है। हैरानी की बात है कि रिश्तों में भी यही भावना पनप रही है।
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सवाल- कभी दिल उदास होता है?
जवाब-
कहते थे कि  चंडीगढ़ हरी झाड़ियों व चिट्टी दाढ़ियों का शहर है, लेकिन अब सब कुछ बदल गया है। शहर में ओपन स्पेस खत्म हो गया है। यह बहुत दुख देता है। जब मैं शहर में आई थी तब पिकाडली का एरिया पूरा खाली होता था, आज पूरी तरह से भरा हुआ है। मेलजोल की भावना अब शहर के लोगों में खत्म होती जा रही है।

सवाल- मीडिएशन सेंटरों में मामलें क्यों बढ़ रहे हैं?
जवाब-
मीडिएशन सेंटर में कोऑर्डिनेटर रहते हुए मैं देख रही हूं कि लोगों ने रिश्तों को बनाए रखने के लिए कोशिश करना छोड़ दिया है। किसी के पास रिश्तों के लिए समय नहीं है। अब तो ऐसा हो गया है कि शादी के दो महीने के अंदर ही सब कुछ खत्म कर युवतियां चूड़ा पहने ही मीडिएशन सेंटर पहुंच जाती हैं। हम दोनों को यही समझाते हैं कि रिश्तों में एफर्ट दिखाना बहुत जरूरी है। शायद इस वजह से ही आज हर चार में से एक व्यक्ति मेंटल स्ट्रेस से पीड़ित है।

सवाल- खुद को फिट कैसे रख पाती हैं?
जवाब-
रोजाना सुबह उठकर प्राणायाम करना, हेल्दी खाने में विश्वास रखती हूं। पढ़ने का बहुत शौक है, इसलिए रोजाना एक घंटे पढ़ती हूं, चाहे वो अखबार ही क्यों न हो। यह वकालत के लिए भी बहुत जरूरी है। रात 10 बजे सोना और सुबह 4 से 5 बजे के बीच उठना रोज का रूटीन है।

सवाल- वकालत और सामाजिक कार्यों के बीच तालमेल कैसे?
जवाब-
वकालत छोड़ नहीं सकते, लेकिन अब समझ आ गया है कि इस प्रोफेशन में रहते हम जितना लोगों के भले के लिए काम कर सकते हैं उतना कहीं नहीं कर सकते। इस वजह से ही हमने साल 2015 में सिओली का गठन किया, जिसका मकसद है कि वकालत के द्वारा हाईकोर्ट में जनहित याचिकाएं दायर कर पूरे समाज के लिए काम करना। मैं 17 साल पंजाब एजी ऑफिस में रही, लेकिन कई बार ऐसे मौैके रहे, जब सरकारी वकील रहते हुए भी सरकार के खिलाफ  जाकर लोगों के लिए जो अच्छा रहा वह काम किया।
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