हमारा गांव मस्तगढ़ भारत-पाकिस्तान सीमा पर खेमकरण एरिया में है। रोजगार के चक्कर में 36 साल पहले गांव छूट गया, लेकिन गांव और खेती के लिए दिल में प्यार कभी कम नहीं हुआ।
1982 में जब फेज-7 में मकान बनाया तो उसमें गार्डन के लिए बाकायदा जगह रखी। उस गार्डन से ऐसा रिश्ता है, रोजाना आंख खुलते ही उसके प्रति झुकाव बढ़ जाता है।
गार्डन में बैठने से ऐसा लगता है मानो अपने गांव में ही हूं। दूसरा गार्डन से रोजाना सब्जी, फल व फूल मिलते रहते हैं। इससे गार्डन से सभी का लगाव बढ़ जाता है। यह कहना है जाने माने बिजनेसमैन व अकाली दल शहरी के पूर्व प्रधान जसवंत सिंह भुल्लर का।
नींबू से लेकर हर सब्जी गार्डेन में
जसवंत भुल्लर का गार्डन
- फोटो : अमर उजाला
भुल्लर बताते है कि 1980 में गांव से ट्राइसिटी में आ गए थे। करियर के शुरुआत में उन्होंने कुछ समय मनीमाजरा में भी काम किया, लेकिन इसके बाद मोहाली में उन्होंने अपना बिजनेस खड़ा किया। उन्होंने बताया कि वह कितने भी व्यस्त रहें, लेकिन गार्डन के साथ उनकी दोस्ती कभी कम नहीं होती है।
नींबू से लेकर हर सब्जी गार्डेन में
भुल्लर ने बताया कि उन्होंने गार्डन पूरी तरह से गांवों की तर्ज पर विकसित किया है। जैसे गांवों में वह सब्जियां व फल बाग में लगाते हैं। वैसे ही हर सीजनल सब्जी अपने गार्डन में उगाते हैं। इसके अलावा नींबू, अमरूद, आम समेत कई अन्य पौधे भी उन्होंने गार्डन में लगाए है। वहीं, घरवाले जब भी कहीं जाते हैं तो गार्डन के लिए एक पौधा जरूर लाते हैं।
हफ्ते की एक सब्जी गार्डेन से
भुल्लर ने बताया कि उनकी कोशिश यही रहती है कि हफ्ते में एक बार घर के गार्डन में तैयार की गई सब्जी जरूर बने। क्योंकि गार्डन में किसी तरह की खाद का प्रयोग किए बिना वह सब्जियां उगाते हैं। जो शरीर के लिए लाभदायक होती है। वहीं, शरीर भी तंदरुस्त रहता है।