लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी सुप्रीमो राजकुमार सैनी 5611 वोट लेकर तीसरा स्थान झटकने में सफल रहे, हालांकि जमानत उनकी भी जब्त हो गई है। सैनी को 4.56 प्रतिशत मत मिले हैं। सैनी ने बरोदा में भाजपा को खासा नुकसान पहुंचाया। सैनी मतदाताओं के साथ अन्य वोट झटककर उन्होंने योगेश्वर को मिलने वाले मतों में अच्छी-खासी सेंध लगाई। सैनी ने भाजपा से बागी होकर ही अपनी अलग पार्टी बनाई है। 2014 में वह कुरुक्षेत्र सीट से भाजपा की टिकट पर ही लोकसभा सांसद बने थे लेकिन इसके बाद सैनी के शीर्ष नेतृत्व से मतभेद बढ़ते गए और आखिर में उन्होंने पार्टी छोड़ दी।
किसानों में सरकार के प्रति नाराजगी
जाट आरक्षण आंदोलन के समय से जाट समुदाय और भाजपा के रिश्तों में चली आ रही खटास अभी तक मिठास में नहीं बदल पाई है। जाट नेता अब भी आंदोलन के समय किए गए वादे पूरा न करने के आरोप लगाते हैं। 2019 विधानसभा चुनाव में भी जाट समुदाय ने भाजपा के दिग्गज मंत्रियों कैप्टन अभिमन्यु, ओपी धनखड़ व उस समय के भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुभाष बराला को हार का स्वाद चखा दिया था। उस चुनाव में भाजपा के कुछ जाट प्रत्याशी जीते भी, जिसके पीछे उनका गैर विवादित होना व समुदाय में अच्छी पकड़ काम आई। बरोदा उपचुनाव से कुछ समय पहले ही तीन नए कृषि कानूनों का बनना भी भाजपा के लिए नुकसानदेह रहा। बरोदा किसान बहुल क्षेत्र है, इसलिए किसानों ने जमकर भाजपा की खिलाफत की। वह कृषि कानूनों को अपने हित में बिल्कुल नहीं मान रहे।
जींद उपचुनाव का इतिहास दोहराने में नाकाम
भाजपा ने जींद में 52 साल बाद 2018 उपचुनाव में कमल खिलाया था। इनेलो के वयोवृद्ध विधायक हरिचंद मिड्ढा की मृत्यु से यह सीट खाली हुई थी। भाजपा ने यहां कृष्ण मिड्ढा को इनेलो से अपने पाले में लाकर चुनाव लड़वाया व बड़े अंतर से सीट जीती थी। उस समय भाजपा ने जजपा प्रत्याशी दिग्विजय चौटाला व कांग्रेस प्रत्याशी रणदीप सुरजेवाला को पराजित किया था। जाटलैंड में यह भाजपा की बड़ी जीत थी। भाजपा बरोदा में भी यही करिश्मा करना चाह रही थी लेकिन सफल नहीं हो पाई।