खेतों में लहलहाती फसलें... गिद्दे और भंगड़े की मस्ती की बात ही कुछ अलग है। बेशक रोजगार और प्रोफेशन इनको विदेश खींच ले गया हो, लेकिन हर एनआरआई के दिल में बसता है पंजाब। बैसाखी पर याद आने लगते हैं वे लम्हे जिनका इंतजार एक साल तक रहता था।
बैसाखी पर एनआरआई सवेरे गुरुद्वारा पहुंचते हैं और शाम के समय होता है बैसाखी मेला या पार्टी। खरड़ से ऑस्ट्रेलिया में जाकर बसे एनआरआई केविन खजूरिया ने बताया कि मेलबर्न में उन्होंने पंजाब के दोस्तों का एक ग्रुप बनाया है। यह ग्रुप बैसाखी पर अपने परिवार के साथ पहले डेंडियांग में एकत्र होता था। अब थोड़ा ट्रेंड चेंज हो गया है और मेलबर्न में ही हॉल में भंगड़े, गिद्दे का इंतजाम करके मेला लगाते हैं। उन्होंने बताया कि उनका जिस्म चाहे विदेश में है, लेकिन आत्मा पंजाब में ही बसती है।
बठिंडा के रहने वाले एनआरआई हरजीत सिंह ने फोन पर बताया कि पंजाब की बैसाखी की बात ही अलग है। विदेश में त्योहार मनाते जरूर हैं पर असल मस्ती तो पंजाब में है। फ्रांस के एनआरआई गुरप्रीत सिंह कंग ने बताया कि वह कुछ दिन पहले ही पंजाब आए थे। यहां की बात निराली है। पंजाब में बैसाखी पर दोस्तों संग मस्ती की बात अलग है।