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Punjab: गठबंधन छोड़ अखाड़े में उतरी बसपा, सभी 13 सीटों पर उतारे उम्मीदवार, गड़बड़ाया शिअद का गणित

Tue, 07 May 2024 01:42 PM IST
निवेदिता वर्मा विशाल पाठक, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

पंजाब में शिअद और बसपा एकजुट होकर दलित वोट बैंक पर अच्छा प्रभाव डालते थे, लेकिन बसपा की डगर अलग होते ही शिअद का दलित वोट बैंक का समीकरण गड़बड़ा गया है। यही कारण है कि शिअद इस बार पंथक, बंदी सिंहों, बेअदबी और अन्य मुद्दों को लेकर आगे बढ़ रहा है।
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बसपा सुप्रीमो मायावती। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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पंजाब में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने सभी 13 सीटों पर अपने प्रत्याशियों का एलान कर दिया है। 25 साल बाद प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के साथ गठबंधन में चुनावी दंगल में उतरा था। 
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117 में से बसपा ने 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जबकि 97 पर शिअद ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था। आप की लहर के आगे किसी दल का वजूद कायम नहीं रहा। 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा को केवल 1.77 प्रतिशत वोट पड़े थे, जबकि 1996 के लोकसभा चुनाव में शिअद और बसपा ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़कर प्रदेश भर में 13 में से 11 सीटों पर जीत दर्ज की थी। 

शिअद और बसपा का प्रदेश के दलित वोटरों पर कभी अच्छा प्रभाव माना जाता था। 2022 के विधानसभा चुनाव में दलित वोट बैंक के बुनियाद पर ही गठबंधन के तहत सत्ता में आने का सपना संजोया गया था, लेकिन झाड़ू ने सभी समीकरण का सफाया कर डाला। एक बार फिर गठबंधन की डगर छोड़ बसपा चुनावी अखाड़े में उतरी है। 
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बसपा ने गठबंधन के कारण खोया दलितों का जनाधार
खुद बसपा सुप्रीमो मायावती इस थ्योरी पर चल रही हैं कि गठबंधन की वजह से उनकी पार्टी का वजूद माने जाने वाले दलित वोट बैंक उनके हाथ से निकल गया है। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव से पहले मायावती ने उत्तर प्रदेश के तर्ज पर पंजाब में भी अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी थी, ताकि दलित समुदाय का दोबारा विश्वास और जनाधार हासिल किया जा सके, लेकिन प्रदेश में 32 प्रतिशत के करीब दलित वोट बैंक भी अब बिखर गया है, ऐसे में बसपा कहीं न कहीं लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कभी साथ रहे सहयोगी दल शिरोमणि अकाली दल के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। 

शिअद के वोट बैंक को इससे झटका लग सकता है। यहां तक की जिन सीटों पर जीत का मार्जिन बेहद कम देखने को मिलता है, वहां दलित वोटरों के बंटने के कारण हार और जीत का अंतर बेहद नजदीकी साबित होगा। 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा को वोट शेयर बढ़ा था, जोकि 3.49 प्रतिशत दर्ज किया गया था। 2014 में यह वोट शेयर 1.9 प्रतिशत था। ऐसे में प्रदेश में अपने वोट शेयर ग्राफ में इजाफा करने के मनसूबे से भी बसपा अकेले डगर तय कर रही है।

लंबे समय से दलितों का विश्वास जीतने का प्रयास जारी
1997 के बाद से बसपा को राज्य में कोई सीट नहीं मिली है। 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 11 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे। एक को छोड़कर कोई भी प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सका था। सिर्फ बसपा के प्रदेश अध्यक्ष अवतार सिंह करीमपुरी फिल्लौर सुरक्षित सीट पर अपनी जमानत बचाने में कामयाब हो पाए थे। 2012 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो बसपा ने 109 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे, लेकिन कोई भी जमानत तक नहीं बचा पाया था। 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी ने तीन सीटों से अपने उम्मीदवार उतारे थे।

जालंधर एससी सीट से बलविंदर कुमार, होशियारपुर एससी सीट से खुशीराम और आनंदपुर साहिब सीट से विक्रम सिंह सोढी को उम्मीदवार बनाया गया था। इसी तरह विधानसभा चुनाव 2022 में फगवाड़ा सीट से जसवीर सिंह गढ़ी ने भी चुनाव लड़ा था। बता दें कि बसपा ने वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में फिल्लौर सीट पर जीत दर्ज की थी, जबकि वर्ष 1992 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने पंजाब में 9 सीटों को अपने नाम करने करिश्मा किया था। ऐसा ही नतीजों की उम्मीद पार्टी इस लोकसभा चुनाव से लगा रही है। यही कारण है कि पार्टी ने गठबंधन न रह कर अकेले ही चुनाव मैदान में उतरने का फैसला लिया। पिछली विधानसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ एक सीट जीतने में सफल रही, वो भी तब जब वह शिअद के साथ गठबंधन में थी।

बसपा ने उतारे हैं ये चेहरे
बहुजन समाज पार्टी ने होशियारपुर से राकेश कुमार सुमन, फिरोजपुर से सुरिंदर कंबोज, संगरूर से डॉ. मक्खन सिंह, पटियाला से जगजीत सिंह छड़बड़, जालंधर से बलविंदर कुमार, फरीदकोट से गुरबख्श सिंह चौहान, बठिंडा से लखवीर सिंह, फतेहगढ़ साहिब से कुलवंत सिंह, गुरदासपुर सेर राज कुमार जनोतरा, लुधियाना से दविंदर सिंह पनेसर, खडूर साहिब से सतनाम सिंह तूर, अमृतसर से विशाल सिद्धू और आनंदपुर साहिब से जसवीर सिंह गढ़ी को प्रत्याशी बनाया है।
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