पिछले चार दशकों के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का जादू हरियाणा में नहीं चल पाया है। हर चुनाव में बसपा कभी गठबंधन के साथ तो कभी दसों सीट पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ती रही है।
एक जमाने में पार्टी का वोट शेयर 15 फीसदी तक पहुंच गया था, मगर पार्टी उसे भी भुनाने में नाकामयाब रही। बीते कुछ सालों में न केवल पारंपरिक दलित वोट बैंक खिसका, बल्कि पार्टी के नेता भी दूर होते चले गए। संगठन के स्तर पर भी बसपा कमजोर होती गई।
हालांकि कुछ समय पहले पार्टी ने मजबूती के लिए कदम उठाए हैं। पार्टी ने चुनाव की तैयारियों से पहले अध्यक्ष के तौर पर युवा नेता राजबीर सोरखी को नियुक्त किया है। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में बूथ स्तर पर पार्टी के पुराने कॉडर वोट बैंक को मजबूत करने के लिए अभियान चलाया हुआ है। साथ ही रोहतक, फरीदाबाद, सोनीपत, हिसार और करनाल में अपने उम्मीदवार भी घोषित कर चुकी है। पार्टी का दावा है कि अगले कुछ दिनों में बाकी बची पांच सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर देगी।
पार्टी को सार्वाधिक वोट साल 2009 में मिले। उस दौरान अपने दम पर दस उम्मीदवार उतारे और उसे 15 फीसदी से ज्यादा वोट मिले। कोई उम्मीदवार तो नहीं जीता, मगर पार्टी ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई। इस चुनाव के बाद से पार्टी की सियासी जमीन खिसकती चली गई। उसके बाद हुए दो लोकसभा चुनाव में पार्टी पांच फीसदी वोट शेयर के आंकड़े को नहीं छू सकी। 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा को मात्र 3.6 फीसदी वोट मिले थे।
गठबंधन करती गई और तोड़ती रही
1998 में बसपा ने इनेलो के साथ गठबंधन किया और तीन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। इनमें से एक प्रत्याशी जीता भी। उसके कुछ ही दिन बाद बसपा ने इनेलो से गठबंधन तोड़ लिया। 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद बसपा ने हजकां के साथ गठबंधन किया। मगर यह समझौता ज्यादा दिन टिक नहीं सका। मई 2018 में पार्टी ने इनेलो के साथ गठबंधन किया। मायावती ने अभय सिंह चौटाला को राखी बांधकर गठबंधन को और मजबूत किया, मगर लोकसभा चुनाव से पहले ही यह करार टूट गया। 2019 के चुनाव में बसपा ने राजकुमार सैनी की पार्टी लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी (लोसुपा) का साथ पकड़ा। चुनाव के बाद यह भी टूट गया। लोसुपा से साथ छूटने के बाद बसपा से गठबंधन किया और एक महीने बाद बसपा ने अलग राह पकड़ ली।
बसपा का सिर्फ एक ही सांसद
हरियाणा के राजनीतिक इतिहास में बसपा का अब तक सिर्फ एक ही सांसद चुना गया है। 1998 में बसपा ने इनेलो के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा। बसपा के पुराने नेता अमन नागरा अंबाला लोकसभा चुनाव में उतरे और उन्होंने भाजपा उम्मीदवार को 2864 वोटों से हराया। अमन बसपा के पहले और आखिरी सांसद हैं। उसके बाद बसपा का कोई सांसद नहीं बना।
बसपा का साल दर साल प्रदर्शन
साल सीटें वोट शेयर जीत
1989 9 1.62 00
1991 1 1.79 00
1996 6 6.59 00
1998 3 7.68 01
1999 3 1.96 00
2004 10 4.98 00
2009 10 15.75 00
2014 10 4.60 00
2019 8 3.6 00
नेतृत्व नहीं होने से बिखरती गई पार्टी
राजनीतिक विश्लेषक सतीश त्यागी ने बताया कि बसपा को आज तक कोई बढ़िया नेतृत्व नहीं मिला है। लीडरशिप नहीं होने की वजह से पार्टी का वोटबैंक बिखरता रहा है। एक कारण यह भी है कि मायावती की प्राथमिकता में हरियाणा कभी नहीं रहा है। जब चाहा तो किसी से समझौता कर लिया। जब किसी नेता ने अच्छा काम किया तो उसे बाद में हटा दिया गया। मायावती के दौरे भी नहीं होते हैं। ऐसे में पार्टी कैसे मजबूत हो पाएगी। 2007 से 2009 के बीच पार्टी ने अपनी मजबूत जमीन तैयार की थी। उस समय ऐसा लग रहा था कि पार्टी हरियाणा में कुछ कमाल दिखाएगी, मगर मायावती का करिश्माई जादू नहीं चला।
बसपा जमीन पर काम करने वाली पार्टी है। पिछले कई महीने से पार्टी ग्रामीणों में बूथ स्तर पर अपने कॉडर को मजबूत करने का काम कर रही है। पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व निरंतर हमारे संपर्क में हैं। निश्चित ही इस बार पार्टी के परिणाम चमत्कारी होने वाले हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती भी हरियाणा आएंगी।
- राजबीर सोरखी, प्रदेश अध्यक्ष बसपा