कहने को तो सेक्टर-16 का हॉस्पिटल मल्टीस्पेशलिएटी है, लेकिन इमरजेंसी में कई जरूरी सामानों की बेहद कमी रहती है। इसका खामियाजा मरीजों को उठाना पड़ता है। यदि मरीज सामान ले आते हैं तो उसका काम आसान हो जाता है, जो नहीं ला पाते, उन्हें आधे-अधूरे इलाज पर ही संतोष करना पड़ता है।
पिछले दिनों जब डॉग बाइट के केस आ रहे थे तो लोगों को डेटॉल व साबुन खुद खरीद कर लाना पड़ रहा था। सूत्रों ने बताया कई बार सामान तो इमरजेंसी में मौजूद रहता है, लेकिन फिर भी डाक्टर मरीज से मंगवा लेते हैं।
ज्यादा सामान होने पर निचले कर्मचारी अपने पास ही रख लेते हैं और बाद में मेडिकल स्टोर वापस कर रुपये ले लेते। हास्पिटल से सामान मंगवाने के बाद अमर उजाला ने पड़ताल की तो पता चला कि कई ऐसे सामान हैं जो मरीजों से मंगवाए जाते हैं।
शुगर की स्ट्रिप तक मरीजों से मंगवाई जाती
सेक्टर-16 हास्पिटल की इमरजेंसी में जरूरी सामान कई दिनों से नहीं है। दो महीने पहले दवा के लिए काफी मारामारी मचती थी। एंटीबायोटिक दवाओं के अलावा कोई भी दवाएं नहीं थी। जांच में पता चला कि मरीजों से शुगर जांच की स्ट्रिप, कॉटन का रोल, टांके लगाने के लिए धागे व कभी कभार तो सीरिंज भी खरीदने के लिए मरीजों को बोला जाता है।
हजारों मरीजों के लिए एक ही दुकान
हास्पिटल में में एक ही मेडिकल स्टोर है। दुकान में हर वक्त काफी भीड़ होती है। एक मरीज को दवा लेने के लिए कम से कम 15-20 मिनट का वक्त लगता है। इससे मरीजों की पीड़ा और बढ़ जाती है। आसपास दुकानें नहीं होने के कारण मरीजों के सामने भी इसी दुकान पर जाने की मजबूरी बन जाती है।
आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को पूरा सामान दिया जा रहा है। कुछ ही ऐसे मरीज होंगे, जिनसे सामान मंगवाया गया होगा, फिर भी मैं इस मामले को चेक करवाऊंगी।
डा. वंदना गुप्ता, मेडिकल सुपरीटेंडेंट, सेक्टर -16 हास्पिटल
केस-1
धनास निवासी राम को रात के वक्त चोट लग गई थी। वह इलाज के लिए सेक्टर -16 हास्पिटल पहुंचा। डाक्टरों ने घाव देखा तो पर्ची में कुछ दवाओं के साथ टांके लाने को भी बोल दिया गया। हास्पिटल की दुकान से ही राम को टांक लाने पड़े। तब जाकर उसका इलाज शुरू हुआ। दवाओं व टांके खरीदने में उसे करीब 300 रुपये देने पड़े।
केस -2
सेक्टर -24 निवासी रोहित के गर्दन के पास फैक्चर हो गया था। इलाज के लिए वह सेक्टर 16 पहुंचा। प्लास्टर चढ़ाने के बाद बिना कॉटन के उसके बैंडज लगा दिए गए। जब रोहित ने कॉटन के बारे में पूछा तो पता चला कि कॉटन नहीं है। आखिर में उसे हास्पिटल की दुकान से कॉटन खरीद कर लानी पड़ी। फिर प्लास्टर में बैंडज लगाई गई।