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Ram Mandir: मिला था भूमि पूजन का न्योता, कट्टरपंथियों के दबाव में नहीं गए जत्थेदार

Thu, 06 Aug 2020 10:19 AM IST
खुशबू गोयल अशोक नीर, अमृतसर

सार

  • श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार को मिला था कार्यक्रम में आने का न्योता
  • प्रधानमंत्री ने भूमि पूजन कार्यक्रम में सिख समुदायों को अनुष्ठान से जोड़ा
  • प्रधानमंत्री मोदी ने किया श्री अमृतसर साहिब व श्री पटना साहिब जिक्र
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राम मंदिर भूमि पूजन - फोटो : ANI
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विस्तार
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राम जन्म भूमि ट्रस्ट की ओर से भूमि पूजन कार्यक्रम में शामिल होने के लिए सिखों को प्रतिनिधित्व देने के लिए सिख धर्म की सर्वोच्च अदालत श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह सहित अन्य तख्तों के जत्थेदारों को न्योता भेजा गया। लेकिन कट्टरपंथियों के दबाव में कार्यक्रम में शामिल न होकर जत्थेदार साहिबान ने हिंदू-सिखों की सदियों पुरानी सांझ को चोट पहुंचाई।
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जबकि अयोध्या में प्रभु राम मंदिर निर्माण के भूमि पूजन कार्यक्रम के दौरान अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्री अमृतसर साहिब व पटना साहिब का जिक्र कर सिख धर्म के दो सर्वोच्च धार्मिक स्थानों को इस पावन अनुष्ठान के साथ जोड़ा। श्री अमृतसर साहिब में सिख धर्म का महान धार्मिक केंद्र सचखंड श्री हरमंदिर साहिब है। वहीं भक्ति और शक्ति का स्रोत श्री अकाल तख्त साहिब है।

दूसरी तरफ तख्त श्री पटना साहिब जहां दशम पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अवतार लिया था। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उल्लेख कर सिखों के दोनों केंद्रीय बिंदुओं को राममय में सराबोर बताया। वहीं अलग-अलग महापुरुषों व ऋषियों द्वारा लिखी रामायण का उल्लेख करते कहा कि श्री गुरु गोबिंद सिंह ने भी गोबिंद रामायण लिखी है। श्री गुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित दशम ग्रंथ में राम अवतार व कृष्ण अवतार के दो अध्याय हैं।   
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तख्त साहिबान के जत्थेदारों की गैरहाजिरी

तख्त साहिबान के जत्थेदारों द्वारा इस कार्यक्रम में शामिल न होना पंजाब की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत दे रहा है। प्रदेश भाजपा 2015 से शिअद के साथ गठजोड़ खत्म कर एकला चलो के रास्ते अपनी राजनीति के नए रास्ते तलाशना चाहती है। वहीं अकाली दल के लिए अपने खोए हुए पंथक आधार को प्राप्त करना सबसे बड़ी चुनौती है।

जत्थेदारों का इस कार्यक्रम में शामिल न होना इस बात के संकेत हैं कि शिअद अपनी सिख विचारधारा में बदलाव कर पंथक विचारधारा की तरफ अग्रसर हो रहा है। पंजाब विधानसभा चुनाव में पौने दो वर्ष का समय है, अकाली दल को इससे पहले एसजीपीसी चुनाव का सामना करना है। शिअद (बादल) को इन चुनावों में बागी हुए सुखदेव सिंह ढींढसा, रंजीत सिंह ब्रह्मपुरा के साथ-साथ बादल विरोधी कई पंथक संगठनों से कड़ी चुनौती मिलती दिख रही है।

जत्थेदार इस अनुष्ठान में शामिल होते तो पंथक संगठनों के साथ-साथ अलगाववादियों व कट्टरपंथियों को बादल विरोधी प्रचार का मौका मिलता। एसजीपीसी के चुनाव में बादल दल का पंथक वोट वापस लौटा तो फिर आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश की राजनीती में नई समीकरण पैदा होंगे। याद रहे कि जत्थेदारों की नियुक्ति शिअद (बादल) की अगुवाई में काम कर रही एसजीपीसी द्वारा की जाती है।
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