बचपन बचाने के लिए भारत यात्रा पर निकले नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी वीरवार को पंजाब यूनिवर्सिटी पहुंचे। सत्यार्थी ने मंच से बुलंद आवाज में युवाओं से कहा कि तुम लोगों को आजाद भारत इसलिए नहीं दिलाया कि बेटियों की दुर्गति करो। आजादी हमें ऐसे दिन देखने के लिए नहीं मिली है।
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उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ में दस साल की बच्ची से रेप और उसके मां बनने की घटना को चुप्पी और पुरानी मानसिकता का एक घिनौना सच बताया। उन्होंने कहा कि बच्ची की आवाज को मां-बाप ने दबाए रखा। क्योंकि उनकी मानसिकता ऐसी थी। अपनों ने ही बच्ची की यह हालत कर दी तो मां-बाप ने बजाए आवाज उठाने के समाज केडर से उसे दबा दिया। सत्यार्थी ने कहा कि एक बात सभी जान लें, इज्जत उसकी लुटती है, जो ऐसी घिनौनी हरकत करते हैं।
डर से लाखों भक्त बनाने वाले बाबा जेल में मिलते हैं
सत्यार्थी ने धर्म के नाम पर शोषण करने वालों पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि डर से लाखों भक्तों की भीड़ जुटाने वाले बाबा अंत में जेल में ही मिलते हैं। ऐसे धार्मिक पाखंडियों से बेटियों को बचाने की जरूरत है। मेरी लड़ाई चुप्पी और पुरानी मानसिकता के खिलाफ है। सत्यार्थी ने कहा कि वे चुप नहीं रहेंगे। गुस्सा आता है लेकिन हिंसा नहीं करेंगे। गुस्से को अपना हथियार बनाएंगे ताकि जिस भारत का सपना देखा है, उसे पूरा कर सकूं।
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दुर्गा-लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा, बेटियों की दुर्गति
भारत यात्रा पर निकले नोबेल विजेता कैलाश सत्यार्थी
दुर्गा-लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा, बेटियों की दुर्गति
कैलाश सत्यार्थी ने कहा भारत एक महान देश है। शक्ति के लिए दुर्गा, धन के लिए लक्ष्मी और विद्या केलिए सरस्वती की पूजा की जाती है। लेकिन धरती पर देवी रूपी बेटियों की क्या दुर्गति हो रही है? सत्यार्थी ने कहा कि वे एक ऐसा सुरक्षित भारत चाहते हैं, जब बेटी घर आने से लेट हो जाए, तो उसकी मां, बाप और भाई को टेंशन ना हो। सुरक्षित भारत तब बनेगा, जब हर बच्चा सुरक्षित होगा। हमें खुद तय करना है कि डर के साये में जिंदगी जीनी है या आजादी से।
शिमला गैंगरेप पर भरे गले से कहा, ऐसे दिन देखने के लिए नहीं हुए आजाद
युवाओं से अपने भाषण में कैलाश सत्यार्थी ने शिमला गैंगरेप पर बेहद दुख जताया। भरे मन से उन्होंने कहा कि ऐसे दिन देखने केलिए तो आजादी नहीं मिली? सत्यार्थी ने कहा कि उन्होंने यह दुख महसूस किया है। क्योंकि उस बेटी का पिता-मां को तीन दिन अपने पास ठहराया था। सत्यार्थी ने कहा कि वे शिमला इसलिए नहीं आए, क्योंकि एक मां-बाप केदुख पर राजनीति हो रही थी।
जब इज्जत बचेगी, तब मंदिरों और मस्जिदों के सही मायने हैं
कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि मंदिर, मस्जिद और गिराजाघर केसही मायने तब हैं, जब बेटियों की इज्जत सुरक्षित रहेगी। इसका कोई फायदा नहीं है कि बाहर बेटियों की इज्जत लुट रही हो और धर्म के दरवाजे बंद हो। उन्होंने कहा कि भारत यात्रा में सभी का सहयोग मिल रहा है।
सभी धर्म केअनुयार्यी, पार्टियों केनेता, हिंदूवादी संगठन, सच्चे नेता उनकेसाथ इस मंच पर हैं। धर्म के अनुयायी ऐसे हो जो खुले मंच से कहें कि यौन शोषण के दोषियों को उनके धर्म में शामिल नहीं किया जाएगा। यह भारत यात्रा मंदिरों में भी रुकी और मस्जिदों में भी। यह कोई धर्म की लड़ाई नहीं है। बल्कि बचपन को बचाकर नये भारत केलिए लड़ाई है।
बच्चों को भौतिक सुविधा नहीं प्यार चाहिए
सत्यार्थी ने मुंबई का किस्सा सुनाया। बड़े अफसर दंपति के13 साल केबेटे ने जहर खाकर जान दे दी। मां-बाप मानने को तैयार नहीं, क्योंकि वे अपने बेटे की सभी जरूरतें पूरी करते थे। पुलिस जांच में पता चला कि बच्चा चार माह से उसकेचार रिश्तेदारों द्वारा दरिंदगी का शिकार बनाया जा रहा था। इसलिए उसने अपनी जान दे दी। सत्यार्थी ने कहा कि ऐसा इसलिए हुआ था कि क्योंकि लग्जरी जरूरतें पूरी करने वाले उस बच्चे केमां-बाप केपास बेटे को प्यार देने का समय नहीं था। कभी उसकेपास बैठकर उसे जाना ही नहीं।