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पंजाब में भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण होंगे 2022 के विधानसभा चुनाव

Mon, 28 Sep 2020 04:30 AM IST
दुष्यंत शर्मा सुरिंदर पाल, जालंधर
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demo pic - फोटो : Amar Ujala
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पंजाब में गठबंधन से अकाली दल के अलग होने के बाद अब भाजपा के लिए अपना वजूद कायम रखना और सत्ता की कुर्सी तक पहुंचा एक बड़ी चुनौती होगा। सूबे में 2022 के विधानसभा चुनाव में  भाजपा को स्थापित हो चुकीं तीन बड़ी राजनीतिक पार्टियों से टक्कर लेनी होगी और अपने आठ प्रतिशत वोट को 30 फीसदी तक लाना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। लिहाजा, इससे निपटने को अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं। 

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 पूर्व पीपीएस अधिकारी इकबाल सिंह ललपुरा को राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाकर यह संदेश दे दिया है कि आने वाले दिनों में भाजपा में सिखों को उच्च पदों पर आसीन किया जा सकता है और प्रदेश में सिख नेताओं को आगे लाया जा सकता है।

भाजपा व सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट एचएस फूलका के बीच भी संबंध काफी मधुर बन चुके हैं। पंजाब में 34 सीटें आरक्षित हैं, जिसको लेकर भाजपा की कोर टीम ने अलग रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है। पार्टी के पास प्रदेश में केंद्रीय राज्यमंत्री सोमप्रकाश के अलावा पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री विजय सांपला रविदासिया समाज के नेता हैं।  
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 दरअसल, पंजाब में 2017 के विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ गठबंधन के खिलाफ जबर्दस्त हवा के चलते भाजपा 23 सीटों में से तीन सीट ही जीत पाई थी। भाजपा का वोट बैंक 5.4 फीसदी पर सिमट गया था।

सूबे में कांग्रेस, अकाली दल स्थापित पार्टियां हैं और उनका वोट प्रतिशत काफी अधिक है। वहीं, आम आदमी पार्टी भी पंजाब में अपना आधार व संगठन जमीनी स्तर पर तैयार कर चुकी है। पंजाब में बसपा का जनाधार भी है, लेकिन उसका वोट प्रतिशत 5 प्रतिशत से काफी कम है। भाजपा सूबे में बसपा के साथ भी गठबंधन नहीं कर सकती है, क्योंकि इसका असर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों पर पड़ सकता है। 

सड़क पर गठबंधन तोड़ना दुर्भाग्यपूर्ण: मास्टर मोहन लाल 
पठानकोट। प्रदेश के पूर्व परिवहन मंत्री मास्टर मोहन लाल ने सड़क पर अकाली दल की ओर से गठबंधन तोड़ने की घोषणा को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है। उन्होंने कहा कि भाजपा गठबंधन टूटने से खुश नहीं है। भाजपा और अकाली दल की कोर कमेटी आमने-सामने बैठकर अलग होने का फैसला लेते तो बेहतर होता।

रविवार को अमर उजाला से बातचीत में पूर्व परिवहन मंत्री ने दावा किया कि उनकी पार्टी न सिर्फ 117 सीटों पर चुनाव लड़ेगी बल्कि सरकार भी बनाएगी। उन्होंने कहा कि अकाली नेता 3 महीने केंद्र के इस फैसले का समर्थन करते रहे। लेकिन जैसे ही किसान जत्थेबंदियां सड़कों पर उतरीं तो अकालियों को लगा कि उनका आधार खत्म हो जाएगा तो उन्होंने गठबंधन से अलग होने की घोषणा कर दी। मास्टर ने कहा कि राजनीति में मान-मर्यादा होनी चाहिए। 

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