आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने दवाओं के क्लीनिकल ट्रायल की राह को आसान कर दिया है। इसकी मदद से अब विशेषज्ञ क्लीनिकल ट्रायल का डिजाइन बनाते समय ही उसकी गलतियों और अच्छाइयों को जान सकते हैं, जिसके आधार पर वे उन गलतियों को दोहराने से बचेंगे, जो उनसे पहले के विशेषज्ञों की असफलता का कारण बनीं थी।
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डेटा अब एक ऐसा हथियार बन चुका है, जिसके बल पर कमियों को चिह्नित करने के साथ बेहतरी से जुड़ी चीजें भी आसानी से जान सकते हैं। यह जानकारी बंगलूरू के डॉ. राहुल राठौड़ ने पीजीआई में फार्माकोलॉजी पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में बतौर वक्ता दी। उन्होंने बताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दवाओं के ह्यूमन ट्रायल में सहायता कर रहा है। इससे क्लीनिकल ट्रायल की सफलता दर में भी इजाफा होगा।
उन्होंने कहा कि अब तक 100 में से 97 ट्रायल किसी न किसी गलती से असफल हो रहे हैं। खासतौर पर फेज थ्री ट्रायल में इसकी उपयोगिता सबसे ज्यादा है क्योंकि पहले और दूसरे चरण में 10 से 15 फीसदी फंड ही खर्च होता है। अहम भूमिका फेज थ्री की ही होती है। ऐसे में एआई ने उसकी सफलता को आसान बनाने का रास्ता दिखा दिया है।
एआई के फायदे
- क्लीनिकल ट्रायल में ज्यादा के बजाय कम लोगों पर भी काम हो सकेगा
- डेटा क्लाउड से पुरानी दवा के बारे में सब कुछ पता चल जाएगा
- दवाओं के ट्रायल से संबंधित मरीजों की जानकारी भी आसानी से मिल सकेगी
- क्लीनिकल ट्रायल में पैसे के साथ ही समय की बचत होगी
- क्लाउड डेटा पूर्व के ट्रायल का विश्लेषण आसानी से उपलब्ध कराएगा