चंडीगढ़ में मिलिट्री लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे और अंतिम दिन बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम की एक महत्वपूर्ण लड़ाई पर आधारित ‘क्रॉसिंग द रिवर मेघना’ विषय पर चर्चा हुई। यह लड़ाई भारतीय वायु सेना और थल सेना की ओर से संयुक्त रूप से लड़ी गई थी।
सत्र का संचालन स्क्वाड्रन लीडर राणा छीना ने किया, जिन्होंने बांग्लादेश की स्वतंत्रता की इस महत्वपूर्ण लड़ाई में भाग लिया। इस लड़ाई को युद्ध इतिहास में ‘क्रॉसिंग ऑफ रिवर मेघना’ के रूप में दर्ज किया गया है।
युद्ध का हिस्सा रहे लेफ्टिनेंट जनरल गुरबख्श सिंह सिहोटा ने एक पायलट के रूप में अपनी भूमिका निभाई। उन्होंने बताया कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद 9 दिसंबर 1971 को 5 से 15 किमी लंबी मेघना नदी को पार कर पाकिस्तानी सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था।
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मेजर चंद्रकांत ने भी यह युद्ध लड़ा और मेघना नदी को पार करते हुए जमीन पर लड़ाई में हिस्सा लिया। उन्होंने बताया कि इस दौरान फौज को जबरदस्त नुकसान हुआ, लेकिन भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेनाओं को खदेड़ने और बांग्लादेश को आजाद कराने में अद्वितीय बहादुरी दिखाई।
बतौर पायलट इस युद्ध में भाग लेने वाले ग्रुप कैप्टन सीएस संधू ने बताया कि उस रात हेलीकॉप्टर को उड़ाना बहुत मुश्किल था, क्योंकि हेलीकॉप्टर को रात के समय मेघना नदी को पार करना था। उन्होंने बताया कि चूंकि वे दुश्मन के इलाके के ऊपर उड़ रहे थे और न तो हेलीकॉप्टर की नेवीगेशन लाइट को चलाया जा सकता था और न ही हेलीकॉप्टर की गति बढ़ाई जा सकती थी। कई हेलिकॉप्टरों ने एक साथ उड़ान भरी थी।
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उन्होंने बताया कि कैसे हेलीकॉप्टरों ने केवल गति को काबू में रख एक दूसरे के बीच दूरी बनाए रखी। बाद में उनके हेलीकॉप्टरों पर दुश्मन सैनिकों ने गोलीबारी की, जिससे उनके कई लोग घायल हो गए और उनमें से कुछ की बाद में मौत हो गई। उन्होंने कहा कि आखिरकार उन्होंने कठिन हालात के बावजूद लड़ाई जीत ली। चर्चा के दौरान लेफ्टिनेंट जनरल शमशेर मेहता, जिन्होंने इस लड़ाई में टैंक ब्रिगेड की कमान संभाली थी, युद्ध के इतिहास पर प्रकाश डाला।