अमर उजाला फाउंडेशन ने 11 हजार रुपये की आरंभिक धनराशि के साथ सुखना की बतखों की जीवन रक्षा के लिए एक फंड शुरू किया है। इसमें आप सब से भी इच्छानुसार सहयोग की अपील है।
आप अपना योगदान सेक्टर-9 डी स्थित अमर उजाला के दफ्तर एससीओ 34-37, सेकंड फ्लोर में सुबह दस बजे से छह बजे के बीच जमा करा सकते हैं। न्यूनतम योगदान 100 रुपये है। सभी योगदानकर्ताओं का नाम अखबार में प्रकाशित किया जाएगा।
सिटी ब्यूटीफुल की हसीन बतखें मर रही हैं। ये बतखें भूख से मर रही हैं। ये बतखें उस पंजाब की राजधानी में मर रही हैं जो अपने गेहूं से पूरे मुल्क का पेट भरता है। इन बतखों की लाशें उस सुखना झील में तैर रही हैं, जिस पर चंडीगढ़ ही नहीं, हरियाणा और पंजाब दोनों को नाज है और जिसके किनारे पर हर सुबह दोनों राज्यों के आला अफसर और मिनिस्टर सैर करते हैं। खामोश मौत मरतीं इन बतखों का हम सब पर कर्ज है।
चंडीगढ़ के बाशिंदे हों या बाहर से आए सैलानी। बच्चे हों या बुजुर्ग। सुखना पर आने वाले हर शख्स से सबसे पहले यही बतखें हाथ मिलाने दौड़ती हैं। वे लोगों से बातें करती हैं। लाइन में चलकर मुख्य सड़क तक चली आती हैं। वहीं प्यारी, सफेद बतखें भूखी मर रही हैं। क्या आप और हम इन बतखों का कर्ज चुकाने को तैयार हैं? सर्दी से तो बतखें जूझ लेंगीं। पेट भरा हो तो कुदरत ने बतखों को ठंडे पानी और ठंड दोनों से लड़ना सिखाया है।
दिक्कत बस महफूज ठिकाने और भरपेट खुराक की है। अमर उजाला फाउंडेशन ने इन बतखों का पेट भरने का संकल्प लिया है। आप सबके सहयोग से आपका चहेता अखबार बतखों के लिए साफ-सुरक्षित आवास और पर्याप्त भोजन सुनिश्चित करने में प्रशासन की मदद करेगा। सुखना की लहरों पर तैरते इन सफेद फरिश्तों की जान बचाने के लिए आगे आइए। बतखें आपको आवाज दे रही हैं।
- संपादक